परमेश्वर राजपूत, गरियाबंद/छुरा : लोकतंत्र में पत्रकारिता को जनता की आवाज कहा जाता है। लेकिन जब यही आवाज साजिशन खामोश कर दी जाए और वर्षों बाद भी न्याय न मिले, तो यह केवल एक हत्या नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र पर गहरा प्रहार बन जाती है। 23 जनवरी 2011 को छुरा में हुए युवा पत्रकार उमेश राजपूत की हत्या आज 15 साल बाद भी न्याय व्यवस्था पर सबसे बड़ा सवाल बनकर खड़ी है।
संघर्ष से खड़ा हुआ एक बेखौफ पत्रकार
वनांचल के छोटे से गांव हीराबतर में जन्मे उमेश राजपूत ने अभावों के बीच अपना जीवन गढ़ा। बचपन में पिता को खो देने के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी। मां और बड़े भाई के सहयोग से पढ़ाई जारी रखी और अपनी प्रतिभा के दम पर आकाशवाणी रायपुर, विविध भारती और श्रीलंका रेडियो तक अपनी पहचान बनाई।पत्रकारिता में कदम रखते ही उन्होंने साफ कर दिया था—वे समझौता नहीं करेंगे।
हरिभूमि और नई दुनिया जैसे प्रतिष्ठित अखबारों में काम करते हुए उन्होंने जनहित के मुद्दों को अपनी कलम का केंद्र बनाया।
एक खबर बनी मौत की वजह?
हत्या से पहले प्रकाशित उनकी खबर—
“शुगर पीड़ित आदिवासी महिला की आंख ऑपरेशन से मौत” ने स्वास्थ्य विभाग में हलचल मचा दी थी। आरोप है कि इस खबर के बाद उन्हें छुरा स्वास्थ्य विभाग में बुलाकर न सिर्फ धमकाया गया, बल्कि मारपीट भी की गई। मामला थाना और कोर्ट तक पहुंचा। यहीं नहीं रुके—उन्होंने सूचना का अधिकार (RTI) लगाकर दो डॉक्टरों से जुड़ी जानकारी भी मांगी। क्या यही उनकी सबसे बड़ी “गलती” थी?दिनदहाड़े घर में घुसकर हत्या 23 जनवरी 2011, शाम करीब 6:30 बजे- छुरा में उनके घर के अंदर पांच लोगों की मौजूदगी में उन्हें गोली मार दी गई।
यह कोई सामान्य हत्या नहीं थी।
यह एक संदेश था— “सच लिखोगे, तो अंजाम यही होगा।” 15 साल, 2 जांच एजेंसियां… और नतीजा शून्य 4 साल तक स्थानीय पुलिस जांच करती रही — कोई गिरफ्तारी नहीं फिर मामला सीबीआई को सौंपा गया.
10 साल तक जांच चली
250-300 गवाहों के बयान
1200 पन्नों की चार्जशीट
लेकिन… आज तक हत्यारे आज़ाद हैं।
गायब सबूत, मरते गवाह… और गहराता शक
इस केस में जो सबसे खतरनाक पहलू सामने आया, वह है—
अहम साक्ष्यों का गायब होना
गवाहों की संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु
जांच की दिशा बार-बार बदलना
सूत्र बताते हैं कि यदि इस हत्याकांड का पूरा खुलासा होता, तो रायपुर से दिल्ली तक कई बड़े नाम बेनकाब हो सकते थे, जिनमें प्रभावशाली अधिकारी भी शामिल हो सकते हैं।
क्या इसी वजह से सच को दबा दिया गया?
*राजनीतिक चुप्पी: सबसे बड़ा सवाल
इतना बड़ा मामला होने के बावजूद—
न कोई बड़ा राजनीतिक आंदोलन
न कोई ठोस पहल
न ही लगातार दबाव
क्या एक पत्रकार की हत्या इतनी “सामान्य” हो गई है?
*लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत
उमेश राजपूत की हत्या सिर्फ एक व्यक्ति की हत्या नहीं है।
यह उन तमाम पत्रकारों के लिए चेतावनी है, जो सच्चाई को सामने लाने का साहस रखते हैं।
अगर एक पत्रकार को 15 साल में न्याय नहीं मिलता, तो
आम नागरिक किस भरोसे न्याय की उम्मीद करे?
परिवार आज भी दर-दर न्याय की आस में
उमेश राजपूत का परिवार आज भी न्याय के इंतजार में है।
हर तारीख, हर सुनवाई… लेकिन नतीजा वही—
खामोशी।
⚖️ निष्कर्ष: अब और इंतजार नहीं
यह मामला अब सिर्फ एक हत्या का नहीं रहा—
यह न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता का प्रश्न बन चुका है।
जरूरत है—
इस केस की पुनः निष्पक्ष और समयबद्ध जांच
दोषियों की पहचान और सख्त सजा
और सबसे जरूरी—
सच को सामने लाने की राजनीतिक इच्छाशक्ति
आखिरी सवाल:
👉 क्या उमेश राजपूत को कभी न्याय मिलेगा?
👉 या यह हत्याकांड भी सिस्टम की फाइलों में दफन एक और “अनसुलझा सच” बनकर रह जाएगा?



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