हत्या के मामलों में सुस्त न्याय प्रक्रिया और परिवारों की उपेक्षा—लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की सुरक्षा पर गंभीर चिंता
परमेश्वर राजपूत, गरियाबंद/छुरा:पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है, जिसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है समाज की आवाज़ को शासन और प्रशासन तक पहुंचाना। आम जनमानस की अपेक्षा रहती है कि पत्रकार उनकी समस्याओं, परेशानियों और पीड़ा को अपनी कलम के माध्यम से उजागर करें, ताकि उन्हें न्याय मिल सके। वहीं सरकार और राजनीतिक दल भी पत्रकारों से सहयोग की उम्मीद करते हैं, और पत्रकार समय-समय पर अपने दायित्वों का निर्वहन करते हुए इस विश्वास को बनाए रखते हैं।
लेकिन इसी बीच एक कड़वी सच्चाई भी सामने आती है—जब सच्चाई को उजागर करने वाले पत्रकार ही निशाने पर आ जाते हैं। छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ वर्षों के दौरान ऐसी कई घटनाएं सामने आई हैं, जिन्होंने पत्रकारों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
बिलासपुर के युवा पत्रकार शुशील पाठक की 2010 की हत्या हो या गरियाबंद जिले के छुरा नगर के निर्भीक पत्रकार उमेश राजपूत की 2011 में दिनदहाड़े गोली मारकर की गई हत्या—ये घटनाएं न केवल पत्रकारिता पर हमला हैं, बल्कि लोकतंत्र की मूल भावना को भी चुनौती देती हैं। इसके अलावा बस्तर क्षेत्र में भी एक युवा पत्रकार मुकेश चंद्राकर 2025 की सड़क ठेकेदारों द्वारा हत्या किए जाने की घटना ने हालात की भयावहता को और स्पष्ट कर दिया है।
विडंबना यह है कि जिन पत्रकारों से समाज और प्रशासन सहयोग की अपेक्षा रखते हैं, उन्हीं पत्रकारों के साथ जब ऐसी घटनाएं घटित होती हैं, तो न्याय की प्रक्रिया अक्सर धीमी पड़ जाती है। समय बीतने के साथ ये मामले ठंडे बस्ते में चले जाते हैं और पीड़ित परिवार न्याय के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हो जाते हैं।
ऐसे मामलों में यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या प्रशासन और सरकार पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर पर्याप्त गंभीर हैं? क्या पत्रकार संगठनों की भूमिका केवल घटनाओं के बाद विरोध तक सीमित रह जाती है? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या आमजन भी धीरे-धीरे इन घटनाओं के प्रति संवेदनहीन होते जा रहे हैं?
पत्रकार न केवल अपनी जान जोखिम में डालकर सच्चाई सामने लाते हैं, बल्कि अपने परिवार की सुरक्षा को भी दांव पर लगाते हैं। ऐसे में उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना केवल सरकार या प्रशासन की ही नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी बनती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि पत्रकारों पर होने वाले हमलों के मामलों में त्वरित और कठोर कार्रवाई हो, पीड़ित परिवारों को आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा दी जाए, और एक मजबूत सुरक्षा तंत्र विकसित किया जाए ताकि भविष्य में कोई भी पत्रकार अपनी जिम्मेदारी निभाने से पहले डर महसूस न करे।
यदि लोकतंत्र को मजबूत बनाए रखना है, तो उसकी नींव—पत्रकारिता—को सुरक्षित और सशक्त करना ही होगा।


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