बेमेतरा टेकेश्वर दुबे: जिले के जनपद पंचायत बेरला अंतर्गत ग्राम पंचायत हसदा के किसान श्री जयलाल बैसाखु ने मेहनत, नवाचार और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के माध्यम से अपनी जिंदगी की तस्वीर बदल दी है। कभी बंजर और सूखे पड़े खेत में आज समृद्धि की हरियाली लहलहा रही है। निजी भूमि पर निर्मित डबरी ने न केवल उनकी खेती को नया जीवन दिया, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर किसान के रूप में पहचान भी दिलाई है। जयलाल बैसाखु के पास लगभग 2 एकड़ भूमि थी, जो ऊंचाई पर स्थित होने के कारण बारिश का पानी नहीं रोक पाती थी। खरीफ सीजन में धान की फसल भी मुश्किल से तैयार होती थी और परिवार का भरण-पोषण करना चुनौती बना हुआ था। इसी दौरान उन्हें ग्राम रोजगार सहायक से मनरेगा के तहत “निजी भूमि पर डबरी निर्माण” योजना की जानकारी मिली। उन्होंने तत्काल आवेदन किया, जिसके बाद पंचायत के तकनीकी सहायक द्वारा स्थल निरीक्षण कर डबरी निर्माण की स्वीकृति प्रदान की गई।
मनरेगा के अंतर्गत डबरी निर्माण कार्य शुरू हुआ, जिसमें स्वयं जयलाल और उनके परिवार के सदस्यों ने श्रमिक के रूप में कार्य किया। इससे उन्हें मजदूरी भी प्राप्त हुई और खेत में लगभग 10 फीट गहरी डबरी तैयार हो गई। बारिश के मौसम में डबरी पानी से भर गई और यही पानी उनके जीवन में नई उम्मीद लेकर आया। पानी उपलब्ध होने के बाद जयलाल ने परंपरागत खेती के बजाय “एकीकृत कृषि मॉडल” अपनाया। उन्होंने डबरी में रोहू, कतला और मृगल जैसी मछलियों का पालन शुरू किया। पहली ही खेप में लगभग 12 क्विंटल मछली उत्पादन हुआ, जिससे उन्हें लाखों रुपये की आय प्राप्त हुई। इसके साथ ही उन्होंने डबरी में बत्तख पालन भी शुरू किया। बत्तखों का मल मछलियों के लिए प्राकृतिक आहार बन गया, जिससे दाने का खर्च कम हुआ और बत्तखों की बिक्री से नियमित अतिरिक्त आय मिलने लगी।इतना ही नहीं, डबरी की मेड़ को चौड़ा कर वहां 200 देशी एवं कड़कनाथ मुर्गियों के लिए शेड तैयार किया गया। मुर्गियों की बीट डबरी में गिरकर मछलियों के लिए भोजन का कार्य करती है, वहीं मेड़ों पर उगाई गई सब्जियों के लिए जैविक खाद के रूप में उपयोग होती है। इस समन्वित मॉडल ने खेती, पशुपालन और मत्स्य पालन को एक साथ जोड़कर आय के कई स्रोत तैयार कर दिए।
डबरी के पानी से अब जयलाल सालभर खेती कर रहे हैं। पहले जहां केवल एक फसल मुश्किल से होती थी, वहीं अब धान, गेहूं और मौसमी सब्जियों सहित वर्ष में तीन फसलें ली जा रही हैं। इससे अतिरिक्त आय भी सुनिश्चित हो रही है। आज श्री जयलाल बैसाखु की कुल वार्षिक आय लगभग ₹4.70 लाख से अधिक पहुंच चुकी है। मछली पालन, बत्तख पालन, कड़कनाथ मुर्गी पालन और खेती से होने वाली आमदनी ने उनके परिवार की आर्थिक स्थिति को पूरी तरह बदल दिया है। इतना ही नहीं, वे गांव के अन्य लोगों को भी रोजगार उपलब्ध करा रहे हैं। अपनी सफलता के बारे में जयलाल कहते हैं, “पहले सालभर में 50 हजार रुपये कमाना भी मुश्किल था। मनरेगा से बनी डबरी ने मेरी जिंदगी बदल दी। अब मैं खुद आत्मनिर्भर हूं और दूसरों को भी रोजगार दे रहा हूं। अधिकारी इसे ‘इंटीग्रेटेड फार्मिंग’ कहते हैं, लेकिन मैंने तो सिर्फ मेहनत और सही योजना पर भरोसा किया। जयलाल का यह मॉडल जिले के अन्य किसानों के लिए प्रेरणादायक उदाहरण बन चुका है। मनरेगा, पशुपालन और मत्स्य पालन विभाग के अभिसरण से तैयार यह मॉडल किसानों की आय बढ़ाने में बेहद प्रभावी साबित हो रहा है। जयलाल बैसाखु की यह कहानी इस बात का प्रमाण है कि यदि जल संरक्षण और संसाधनों का सही उपयोग किया जाए, तो सूखी जमीन भी समृद्धि की नई कहानी लिख सकती है। उनका संदेश आज गांव-गांव में प्रेरणा बन रहा है — “पानी रोक लो, पैसा खुद-ब-खुद आएगा।”

