नशा मुक्ति के दावों के बीच बढ़ती लत: आखिर प्रयासों के बावजूद क्यों नहीं थम रहा नशे का विस्तार?

नशा मुक्ति के दावों के बीच बढ़ती लत: आखिर प्रयासों के बावजूद क्यों नहीं थम रहा नशे का विस्तार?

परमेश्वर राजपूत, गरियाबंद :  देश और प्रदेश में पिछले कई वर्षों से प्रशासन, पुलिस विभाग, जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों एवं समाज सेवियों द्वारा नशा मुक्ति अभियान चलाए जा रहे हैं। समय-समय पर विद्यालयों, महाविद्यालयों, ग्राम सभाओं तथा सार्वजनिक कार्यक्रमों में लोगों को नशा मुक्ति की शपथ भी दिलाई जाती है। नशे के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूक करने के लिए रैलियां, संगोष्ठियां और जनजागरण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इसके बावजूद यदि नशा करने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है और शराब की बिक्री में भी निरंतर वृद्धि दर्ज की जा रही है, तो यह निश्चित रूप से एक गंभीर और चिंताजनक विषय है।प्रश्न यह उठता है कि जब नशा मुक्ति के लिए इतने प्रयास किए जा रहे हैं, तब भी अपेक्षित परिणाम क्यों नहीं मिल पा रहे हैं? इसका एक प्रमुख कारण यह हो सकता है कि नशा मुक्ति अभियान अक्सर केवल औपचारिक कार्यक्रमों तक सीमित रह जाते हैं। शपथ दिलाने और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करने के बाद निरंतर निगरानी, परामर्श और पुनर्वास की व्यवस्था कमजोर दिखाई देती है। केवल शपथ लेने से नशे की आदत समाप्त नहीं होती, इसके लिए मजबूत इच्छाशक्ति, पारिवारिक सहयोग और सामाजिक वातावरण की आवश्यकता होती है।

दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि आज के समय में बेरोजगारी, आर्थिक तनाव, पारिवारिक कलह और सामाजिक दबाव भी युवाओं को नशे की ओर धकेल रहे हैं। कई लोग मानसिक तनाव से राहत पाने के लिए शराब और अन्य नशीले पदार्थों का सहारा लेने लगते हैं। ऐसे में केवल जागरूकता कार्यक्रम पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि रोजगार, खेल, सांस्कृतिक गतिविधियों और मानसिक स्वास्थ्य सहायता जैसे सकारात्मक विकल्प भी उपलब्ध कराने होंगे।यह भी विचारणीय है कि एक ओर नशा मुक्ति अभियान चलाए जाते हैं, वहीं दूसरी ओर शराब की बिक्री से सरकारों को बड़ा राजस्व प्राप्त होता है। यह विरोधाभास आम जनता के बीच चर्चा का विषय बना रहता है। जब शराब की उपलब्धता आसान होगी, तो नशे पर पूर्ण नियंत्रण की उम्मीद करना भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

नशे की बढ़ती प्रवृत्ति केवल व्यक्ति को ही नहीं, बल्कि पूरे परिवार और समाज को प्रभावित करती है। घरेलू हिंसा, सड़क दुर्घटनाएं, अपराध, आर्थिक संकट और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के पीछे नशे की महत्वपूर्ण भूमिका देखी जाती है। इसलिए यह विषय केवल कानून व्यवस्था का नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और नैतिक जिम्मेदारी का भी है।आज आवश्यकता इस बात की है कि नशा मुक्ति अभियान को केवल शपथ और भाषणों तक सीमित न रखकर उसे जनआंदोलन का स्वरूप दिया जाए। परिवार, समाज, शिक्षण संस्थान, धार्मिक संगठन, प्रशासन और जनप्रतिनिधि मिलकर दीर्घकालिक एवं प्रभावी रणनीति बनाएं। युवाओं को सकारात्मक दिशा देने, रोजगार के अवसर बढ़ाने और नशे के दुष्प्रभावों के प्रति लगातार जागरूक करने की आवश्यकता है।नशा मुक्ति के लिए किए जा रहे प्रयास तभी सफल माने जाएंगे जब समाज में नशा करने वालों की संख्या घटे, परिवार सुरक्षित हों और युवा पीढ़ी स्वस्थ एवं सकारात्मक भविष्य की ओर अग्रसर हो। अन्यथा बढ़ती शराब बिक्री और बढ़ते नशे के आंकड़े यह प्रश्न उठाते रहेंगे कि आखिर हमारी नशा मुक्ति की कोशिशों में कमी कहां रह गई है।







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