100 कौरवों में एक ऐसा भी था जिसने चुना धर्म का रास्ता, दुर्योधन का साथ छोड़ पांडवों की ओर चला गया था ये भाई

Spread the love

महाभारत की कथा में पांडवों और कौरवों के बीच हुए संघर्ष को धर्म और अधर्म के टकराव के रूप में देखा जाता है। एक ओर पांच पांडव थे, तो दूसरी ओर धृतराष्ट्र के पुत्र कौरव। दुर्योधन और उसके भाइयों की महत्वाकांक्षा तथा पांडवों के साथ हुए अन्याय की घटनाएं महाभारत की कहानी का अहम हिस्सा हैं। लेकिन इसी कौरव परिवार में एक ऐसा राजकुमार भी था, जिसने अपने ही भाइयों के गलत फैसलों का समर्थन नहीं किया।

इस पात्र का नाम था युयुत्सु। वह धृतराष्ट्र का पुत्र था, लेकिन उसकी माता गांधारी नहीं, बल्कि सुगधा नाम की एक वैश्य दासी थीं। महाभारत की कथा में युयुत्सु को ऐसे योद्धा के रूप में याद किया जाता है, जिसने पारिवारिक रिश्तों से ऊपर धर्म और न्याय को महत्व दिया। यही वजह है कि कुरुक्षेत्र के युद्ध में उसने दुर्योधन का साथ छोड़कर पांडवों की सेना में शामिल होने का निर्णय लिया।

कौन था युयुत्सु, जिसका जन्म कौरव परिवार में हुआ?

युयुत्सु धृतराष्ट्र का पुत्र था। उसकी माता सुगधा वैश्य समुदाय से थीं। इस कारण वह गांधारी के गर्भ से जन्मे दुर्योधन और उनके भाइयों से अलग था। हालांकि वह धृतराष्ट्र का पुत्र और कुरुवंश का राजकुमार था, लेकिन कौरव परिवार में उसकी स्थिति अन्य भाइयों जैसी नहीं मानी जाती थी।

युयुत्सु के नाम का अर्थ युद्ध की इच्छा रखने वाला बताया जाता है। लेकिन महाभारत में उसका महत्व केवल एक योद्धा के रूप में नहीं, बल्कि अपने विवेक के आधार पर निर्णय लेने वाले व्यक्ति के रूप में सामने आता है। उसने सत्ता, संपत्ति या पारिवारिक दबाव के बजाय सही और गलत के बीच अंतर को महत्व दिया।

द्रौपदी के अपमान पर किया अपने ही भाइयों का विरोध

महाभारत की सबसे पीड़ादायक घटनाओं में से एक द्रौपदी का चीरहरण प्रसंग है। जुए में पांडवों के सबकुछ हार जाने के बाद द्रौपदी को भरी सभा में अपमानित किया गया। इस घटना ने कुरु सभा में मौजूद लोगों की भूमिका और उनकी चुप्पी पर गंभीर सवाल खड़े किए।

महाभारत की प्रचलित कथाओं में युयुत्सु को उन पात्रों में गिना जाता है, जिन्होंने इस अन्याय का विरोध किया। उसने अपने ही भाइयों के व्यवहार को गलत ठहराया और उन्हें चेताया कि इस तरह के कृत्य का परिणाम पूरे कुरुवंश को भुगतना पड़ सकता है।

उस समय परिवार और सत्ता के प्रभाव में कई लोग खुलकर विरोध नहीं कर पाए थे। ऐसे माहौल में युयुत्सु का अपने ही भाइयों के सामने असहमति जताना उसके चरित्र का महत्वपूर्ण पहलू माना जाता है।

कुरुक्षेत्र में दुर्योधन को छोड़ पांडवों के साथ क्यों गया?

कुरुक्षेत्र में युद्ध शुरू होने से पहले दोनों पक्षों की सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं। महाभारत के वर्णन के अनुसार, इसी समय युधिष्ठिर ने घोषणा की कि जो योद्धा अपना पक्ष बदलना चाहता है, वह ऐसा कर सकता है। इस अवसर पर युयुत्सु ने कौरव सेना छोड़ने का निर्णय लिया।

वह पांडवों के खेमे में पहुंचा और युधिष्ठिर के सामने अपनी इच्छा जाहिर की। उसने अपने ही भाइयों के विरुद्ध युद्ध में पांडवों का साथ देने का फैसला किया। यह निर्णय आसान नहीं था, क्योंकि इसका अर्थ था अपने परिवार और जन्म से जुड़े पक्ष के खिलाफ खड़ा होना।

युयुत्सु का यह कदम महाभारत की कथा में धर्म के प्रति उसकी निष्ठा और स्वतंत्र निर्णय लेने के साहस का उदाहरण माना जाता है।

महाभारत युद्ध के बाद क्या हुआ युयुत्सु का?

कुरुक्षेत्र युद्ध में कौरव पक्ष का लगभग पूरा विनाश हो गया। युयुत्सु उन गिने-चुने कौरवों में शामिल था, जो युद्ध के बाद जीवित रहे। युद्ध समाप्त होने के बाद जब युधिष्ठिर हस्तिनापुर के राजा बने, तब युयुत्सु को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई।

महाभारत की परंपरा के अनुसार, युधिष्ठिर ने उसे राज्य के प्रशासन और देखरेख से जुड़ी जिम्मेदारी दी। बाद में जब पांडवों ने राजपाट छोड़कर महाप्रस्थान का निर्णय लिया, तब परीक्षित को हस्तिनापुर का उत्तराधिकारी बनाया गया। उस समय परीक्षित अल्पायु थे, इसलिए युयुत्सु को राज्य की व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी सौंपे जाने का उल्लेख मिलता है।

युयुत्सु की कहानी क्या सिखाती है?

युयुत्सु का चरित्र महाभारत की उन कहानियों में शामिल है, जो बताती हैं कि किसी व्यक्ति की पहचान केवल उसके परिवार या जन्म से तय नहीं होती। उसके फैसले और कर्म भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं।

धृतराष्ट्र का पुत्र होने के बावजूद युयुत्सु ने दुर्योधन के हर निर्णय का समर्थन नहीं किया। उसने अपने विवेक के अनुसार पक्ष चुना और धर्म के पक्ष में खड़ा हुआ। इसी कारण महाभारत के इस पात्र को पारिवारिक निष्ठा और नैतिक जिम्मेदारी के बीच सही चुनाव करने वाले योद्धा के रूप में याद किया जाता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *