छुरा तहसील कार्यालय की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल, दो अलग खसरों के मामले में आदिवासी किसान दो साल से लगा रहा दफ्तरों के चक्कर
परमेश्वर राजपूत, गरियाबंद/छुरा: राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली और लंबित प्रकरणों के निपटारे को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। छुरा तहसील कार्यालय से जुड़ा एक मामला इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है, जहां एक पक्ष द्वारा निर्धारित अर्थदंड की राशि जमा किए जाने के बावजूद दूसरे पक्ष द्वारा अर्थदंड जमा नहीं किए जाने का हवाला देते हुए पूरे प्रकरण को पोर्टल से खारिज नहीं किए जाने की बात सामने आई है। इसके चलते संबंधित भूमि स्वामी किसान को अपनी जमीन के डायवर्सन की प्रक्रिया आगे बढ़ाने में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
मामला छुरा तहसील क्षेत्र के कलिंग साय पिता सामरथ से जुड़ा है। जानकारी के अनुसार लगभग दो वर्ष पूर्व कलिंग साय के विरुद्ध अपने भूमि स्वामी हक की जमीन पर बिना डायवर्सन के निर्माण कार्य किए जाने को लेकर तहसील कार्यालय छुरा में प्रकरण दर्ज किया गया था। प्रकरण में लगातार सुनवाई होती रही और बाद में मामला अनुविभागीय राजस्व अधिकारी कार्यालय छुरा पहुंच गया। बताया जाता है कि वहां भी मामला कई दिनों तक लंबित रहा।
जनदर्शन में पहुंचा मामला, जल्द सुनवाई की लगाई गुहार
लंबे समय तक मामला लंबित रहने के बाद कलिंग साय ने कलेक्टर के जनदर्शन में आवेदन प्रस्तुत कर मामले की जल्द सुनवाई पूरी करने तथा निर्धारित अर्थदंड जमा करने की इच्छा जताई। इसके बाद अनुविभागीय राजस्व अधिकारी छुरा द्वारा प्रकरण की सुनवाई पूरी करते हुए अर्थदंड की राशि निर्धारित की गई और आवश्यक कार्रवाई के लिए मामला तहसील कार्यालय छुरा भेजा गया।
कलिंग साय के अनुसार उन्होंने निर्धारित अर्थदंड की राशि जमा कर दी तथा प्रकरण को समाप्त करते हुए ऑनलाइन पोर्टल पर केस खारिज करने और अंतिम आदेश की प्रमाणित प्रति उपलब्ध कराने के लिए तहसील कार्यालय में आवेदन दिया।
दूसरे पक्ष का जुर्माना जमा नहीं होने से अटका किसान का काम?
यहीं से पूरा मामला एक नए मोड़ पर पहुंच गया। कलिंग साय का आरोप है कि तहसीलदार छुरा द्वारा उन्हें बताया गया कि अनुविभागीय कार्यालय से जारी आदेश के अनुसार प्रमोद कुमार दीवान पर भी अर्थदंड निर्धारित है, लेकिन उनके द्वारा राशि जमा नहीं की गई है। जब तक दूसरे पक्ष का अर्थदंड जमा नहीं होगा, तब तक पोर्टल से प्रकरण खारिज नहीं किया जा सकता और अंतिम आदेश की नकल भी उपलब्ध नहीं कराई जा सकती।
ऐसे में सवाल उठता है कि यदि प्रकरण में दो अलग-अलग भूमि स्वामियों पर अर्थदंड निर्धारित है और एक व्यक्ति अपनी निर्धारित राशि जमा कर चुका है, तो दूसरे व्यक्ति द्वारा राशि जमा नहीं करने का खामियाजा पहले व्यक्ति को क्यों भुगतना पड़े?
दो अलग खसरे, अलग भूमि स्वामित्व, फिर एक ही प्रकरण क्यों?
मामले को और गंभीर बनाने वाला पहलू यह है कि कलिंग साय और प्रमोद कुमार दीवान की भूमि का विवरण अलग-अलग बताया जा रहा है।
कलिंग साय पिता सामरथ, जाति गोंड़ की भूमि पटवारी हल्का नंबर 24, छुरा, खसरा नंबर 469/2, रकबा 0.03 हेक्टेयर बताई गई है। वहीं प्रमोद कुमार दीवान पिता खोरबाहरा दीवान, जाति कंवर की भूमि खसरा नंबर 469/5, रकबा 0.04 हेक्टेयर बताई गई है। दोनों अलग-अलग परिवारों से संबंधित बताए जा रहे हैं।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब दोनों की भूमि अलग-अलग खसरा नंबरों में दर्ज है, भूमि स्वामित्व भी अलग है और दोनों अलग परिवारों से हैं, तो राजस्व विभाग द्वारा कार्रवाई के दौरान दोनों के प्रकरण को किस आधार पर एक साथ जोड़ा गया?
दो साल तक पेशी में जाता रहा कलिंग साय, दूसरे पक्ष की उपस्थिति पर भी सवाल
कलिंग साय का कहना है कि वह पिछले लगभग दो वर्षों से लगातार तहसील एवं अनुविभागीय राजस्व कार्यालय की पेशियों में उपस्थित होता रहा। वहीं उनका आरोप है कि दूसरे पक्ष के प्रमोद कुमार दीवान कई मौकों पर उपस्थित नहीं हुए। अब स्थिति यह है कि कलिंग साय अपनी ओर से निर्धारित अर्थदंड की राशि जमा कर चुका है, लेकिन दूसरे पक्ष द्वारा अर्थदंड जमा नहीं किए जाने के कारण उसका प्रकरण ऑनलाइन पोर्टल पर समाप्त नहीं हो पा रहा है।
इसके चलते कलिंग साय अपनी भूमि का डायवर्सन कराने के लिए आगे की प्रक्रिया शुरू नहीं कर पा रहा है।
पहले का डायवर्सन आवेदन भी हो चुका है नस्तीबद्ध
कलिंग साय के अनुसार उसने पूर्व में अपनी भूमि के डायवर्सन के लिए अनुविभागीय कार्यालय में आवेदन प्रस्तुत किया था, लेकिन प्रकरण से संबंधित स्थिति स्पष्ट नहीं होने और राजस्व प्रकरण के लंबित रहने के कारण वह आवेदन नस्तीबद्ध हो गया। अब यदि ऑनलाइन रिकॉर्ड में पुराना प्रकरण समाप्त नहीं होता है तो दोबारा डायवर्सन की प्रक्रिया शुरू करना भी उसके लिए मुश्किल हो रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम के कारण किसान का कहना है कि वह राजस्व विभाग के अलग-अलग कार्यालयों के चक्कर लगाने को मजबूर है, जबकि अपनी ओर से निर्धारित अर्थदंड की राशि वह पहले ही जमा कर चुका है।
क्या दूसरे पक्ष से अर्थदंड वसूलने की कार्रवाई होगी?
मामले में अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यदि प्रमोद कुमार दीवान पर भी अर्थदंड निर्धारित हुआ है और उन्होंने अभी तक राशि जमा नहीं की है, तो क्या राजस्व विभाग द्वारा उन्हें विधिवत नोटिस जारी कर अर्थदंड की राशि जमा कराने की कार्रवाई की जाएगी?
यदि शासन-प्रशासन के नियमों के तहत दोनों पक्षों की देयता अलग-अलग निर्धारित है, तो एक पक्ष द्वारा अपनी राशि जमा करने के बाद उसके व्यक्तिगत राजस्व कार्य को दूसरे पक्ष की बकाया राशि के कारण रोकना कितना उचित है—यह भी जांच का विषय है।
तहसील कार्यालय की कार्यप्रणाली पर उठ रहे कई सवाल
इस मामले ने राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं—
– अलग-अलग खसरा नंबर और भूमि स्वामित्व होने के बावजूद दोनों पक्षों को एक ही प्रकरण में क्यों जोड़ा गया?
– यदि दोनों पर अलग-अलग अर्थदंड निर्धारित किया गया था, तो एक पक्ष द्वारा राशि जमा करने के बाद उसका प्रकरण अलग से समाप्त क्यों नहीं किया जा सकता?
– दूसरे पक्ष द्वारा अर्थदंड जमा नहीं करने पर विभाग ने अब तक वसूली या नोटिस की कार्रवाई क्यों नहीं की?
– कलिंग साय द्वारा अर्थदंड जमा किए जाने के बाद अंतिम आदेश की प्रति उपलब्ध कराने में क्या कानूनी अथवा प्रशासनिक बाधा है?
– ऑनलाइन पोर्टल पर प्रकरण समाप्त नहीं होने के कारण किसान की डायवर्सन प्रक्रिया बाधित हो रही है तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है?
– पूर्व में पदस्थ अधिकारियों द्वारा प्रकरण तैयार करने और दर्ज करने में कोई त्रुटि हुई है तो उसकी जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
आदिवासी किसान को कब मिलेगी राहत?
कलिंग साय का कहना है कि वह करीब दो वर्षों से इस मामले को लेकर राजस्व कार्यालयों में चक्कर लगा रहा है। उसने विभाग द्वारा निर्धारित अर्थदंड भी जमा कर दिया है और अब वह चाहता है कि उसके हिस्से का प्रकरण नियमानुसार समाप्त कर अंतिम आदेश की प्रति उपलब्ध कराई जाए, ताकि वह अपनी भूमि के डायवर्सन की प्रक्रिया आगे बढ़ा सके।
मामला अब केवल एक किसान की परेशानी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह राजस्व प्रकरणों के पृथक्करण, जवाबदेही, ऑनलाइन रिकॉर्ड अपडेट और प्रशासनिक प्रक्रिया की पारदर्शिता से जुड़ा महत्वपूर्ण सवाल बन गया है।
अब देखना होगा कि राजस्व विभाग इस मामले में दूसरे पक्ष से अर्थदंड की राशि वसूलने के लिए क्या कार्रवाई करता है और क्या कलिंग साय को उसके हिस्से के प्रकरण में राहत देते हुए लंबित प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाता है। साथ ही यह भी स्पष्ट होना आवश्यक है कि आखिर किस स्तर पर हुई प्रक्रिया अथवा रिकॉर्ड संबंधी गलती के कारण एक पक्ष को अपनी राशि जमा करने के बाद भी करीब राहत के लिए कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।
इस पूरे मामले में राजस्व विभाग के उच्चाधिकारी यदि रिकॉर्ड की जांच कर वस्तुस्थिति स्पष्ट करते हुए जिम्मेदारी तय करें, तो न केवल प्रभावित किसान को राहत मिल सकती है, बल्कि भविष्य में इस तरह की प्रशासनिक उलझनों से भी बचा जा सकता है।




