महालक्ष्मी व्रत 2026: धन, वैभव, सुख और समृद्धि की कामना से रखा जाने वाला महालक्ष्मी व्रत मां लक्ष्मी को समर्पित महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान माना जाता है। परंपरा के अनुसार यह व्रत भाद्रपद शुक्ल अष्टमी से शुरू होकर लगातार 16 दिनों तक चलता है। इस दौरान श्रद्धालु प्रतिदिन मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करते हैं और विशेष रूप से 16 गांठों वाला डोरा धारण करते हैं।
इस व्रत में पहले दिन संकल्प लेने से लेकर अंतिम दिन उद्यापन तक कई धार्मिक नियम और परंपराएं बताई गई हैं। पूजा के दौरान मां लक्ष्मी को निर्धारित संख्या में सामग्री अर्पित करने की भी परंपरा है। आइए जानते हैं 19 सितंबर 2026 से शुरू होने वाले महालक्ष्मी व्रत की पूजा विधि, डोरा बांधने का तरीका और उद्यापन की पूरी प्रक्रिया।
पहले दिन 16 गांठों वाला डोरा कैसे बांधें?
महालक्ष्मी व्रत में 16 गांठों वाले डोरे को विशेष महत्व दिया जाता है। व्रत के पहले दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद कच्चे सूती धागे या कलावे से डोरा तैयार करें और उसमें 16 गांठें लगाएं।
मान्यता के अनुसार हर गांठ बांधते समय मां लक्ष्मी के मंत्र का जाप किया जाता है। डोरा तैयार होने के बाद इसे मां लक्ष्मी के चरणों में अर्पित करें। इसके बाद परंपरा के अनुसार पुरुष इसे दाहिनी कलाई और महिलाएं बाईं कलाई पर बांध सकती हैं। व्रत की अवधि पूरी होने तक इसे धारण करने की परंपरा है।
महालक्ष्मी व्रत की रोजाना पूजा विधि
16 दिनों तक प्रतिदिन स्नान के बाद मां लक्ष्मी की पूजा करें। पहले दिन देवी के सामने व्रत का संकल्प लेना चाहिए। पूजा के लिए एक चौकी को लाल वस्त्र से सजाकर उस पर मां लक्ष्मी की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें।
चौकी के पास जल से भरा कलश रखें। कलश में सिक्का, आम के पत्ते और नारियल रखने की परंपरा है। पूजा शुरू करने से पहले गंगाजल से पूजा स्थल और स्वयं का शुद्धिकरण करें। इसके बाद मां लक्ष्मी को रोली और अक्षत अर्पित करें।
प्रतिदिन घी का दीपक जलाएं और देवी को लाल फूल, कमल, अक्षत, फल और मिठाई अर्पित करें। श्रद्धा के अनुसार अन्य पूजा सामग्री भी चढ़ाई जा सकती है।
कथा के साथ करें महालक्ष्मी मंत्रों का पाठ
पूजन के दौरान महालक्ष्मी व्रत की कथा का पाठ या श्रवण करें। इसके बाद श्री महालक्ष्मी अष्टकम का पाठ किया जा सकता है। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार श्री सूक्त का भी पाठ कर सकते हैं।
पूजा के अंत में मां लक्ष्मी की आरती करें। देवी को खीर या पंचमेवा का भोग लगाएं और फिर परिवार के सदस्यों में प्रसाद वितरित करें।
अंतिम दिन कैसे करें महालक्ष्मी व्रत का उद्यापन?
परंपरा के अनुसार आश्विन कृष्ण अष्टमी को महालक्ष्मी व्रत का अंतिम दिन माना जाता है। इस दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और मां महालक्ष्मी का विशेष पूजन करें।
व्रत के दौरान कलाई पर बांधे गए 16 गांठों वाले डोरे को विधि-विधान से खोलकर मां लक्ष्मी के चरणों में अर्पित करें। इसके बाद पूजा में 16 फूल, 16 फल, 16 मिठाई, 16 सुपारी सहित निर्धारित पूजन सामग्री अर्पित करने की परंपरा बताई गई है।
16 लोगों को भोजन कराने की परंपरा
उद्यापन के अवसर पर 16 घी के दीपक जलाने और महालक्ष्मी अष्टकम तथा श्री सूक्त का पाठ करने की परंपरा है। इसके बाद 16 लोगों को भोजन कराने का विधान बताया जाता है।
पारंपरिक रूप से ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है। हालांकि कई परिवार अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार अतिथियों या जरूरतमंद लोगों को भोजन कराकर भी व्रत का समापन करते हैं।
दान-दक्षिणा के बाद पूरा करें व्रत
उद्यापन के दौरान सुहागिन महिलाओं को दक्षिणा और पूजा सामग्री देने की भी परंपरा है। पूजा में इस्तेमाल की गई कुछ सामग्री को मंदिर में अर्पित किया जा सकता है या जरूरतमंदों को दान किया जा सकता है।
अंत में मां महालक्ष्मी की आरती कर उनका आभार व्यक्त करें और व्रत का संकल्प पूर्ण करें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रद्धा और विधि-विधान से महालक्ष्मी की आराधना करने से घर में सुख-समृद्धि और सौभाग्य की कामना की जाती है।
धार्मिक मान्यता संबंधी सूचना: पूजा-विधि और व्रत के नियम अलग-अलग क्षेत्रों एवं परिवारों की परंपराओं के अनुसार कुछ भिन्न हो सकते हैं। यहां दी गई जानकारी सामान्य धार्मिक परंपराओं पर आधारित है।



