नाइट कर्फ्यू, विस्थापन, विद्युतीकरण और बुनियादी सुविधाओं को लेकर ग्रामीणों ने जताया आक्रोश, 60 दिनों में मांगों पर कार्रवाई का अल्टीमेटम
जनक ध्रुव बोले—जल, जंगल और जमीन आदिवासियों की अस्मिता व आजीविका का आधार; अंबिका मरकाम ने कहा—जनता पर अत्याचार और बेदखली बर्दाश्त नहीं
परमेश्वर राजपूत, गरियाबंद : उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व क्षेत्र में नाइट कर्फ्यू, विस्थापन, विद्युतीकरण, वनग्रामों को राजस्व ग्राम का दर्जा देने तथा पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर आदिवासी समाज की आवाज एक बार फिर बुलंद हुई। तहसील मुख्यालय मैनपुर से लगभग 30 किलोमीटर दूर राजापड़ाव-गौरगांव क्षेत्र के ग्राम कोकड़ी में शनिवार को जल, जंगल, जमीन बचाओ संघर्ष समिति के बैनर तले महाग्रामसभा का आयोजन किया गया। इसमें गरियाबंद और धमतरी जिले के 128 गांवों से हजारों महिला-पुरुष, जनप्रतिनिधि, सामाजिक मुखिया, मांझी, गायता और पुजारी शामिल हुए।महाग्रामसभा में बिन्द्रानवागढ़ विधायक जनक ध्रुव और सिहावा विधायक अंबिका मरकाम ने आदिवासियों के अधिकारों, प्रस्तावित विस्थापन और क्षेत्र में आवागमन पर प्रतिबंधों को लेकर कड़ा रुख अपनाया। दोनों विधायकों ने स्पष्ट कहा कि आदिवासियों के साथ अन्याय बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और उनके हक की लड़ाई सड़क से लेकर न्यायपालिका तक लड़ी जाएगी।
संविधान निर्माता डॉ. आंबेडकर के छायाचित्र पर माल्यार्पण कर हुई शुरुआत
महाग्रामसभा की शुरुआत सुबह 11 बजे संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर के छायाचित्र की पूजा-अर्चना के साथ हुई। सभा की अध्यक्षता हिम्मत सिंह नेताम ने की। इस दौरान विभिन्न गांवों से पहुंचे सामाजिक प्रमुखों और जनप्रतिनिधियों ने क्षेत्र की समस्याओं को प्रमुखता से उठाते हुए आदिवासी समुदाय के पारंपरिक अधिकारों, सुरक्षा और विकास से जुड़े मुद्दों पर अपनी बात रखी।जल, जंगल, जमीन बचाओ संघर्ष समिति के अध्यक्ष सिरधन सोम ने महाग्रामसभा में पारित प्रस्तावों को पढ़कर सुनाया। सभा में पारित संकल्पों पर शासन-प्रशासन से कार्रवाई सुनिश्चित कराने के लिए 60 दिनों की समय-सीमा तय की गई। साथ ही निर्णय लिया गया कि इन मांगों को विधानसभा, लोकसभा, जिला और जनपद स्तर पर उठाया जाएगा। निर्धारित अवधि में कार्रवाई नहीं होने की स्थिति में पेसा अधिनियम के तहत ग्रामसभा के असहयोग संबंधी कदम उठाने की बात कही गई।
‘आदिवासी जंगल छोड़कर कहां जाएंगे?’ विधायक जनक ध्रुव ने उठाए सवाल
महाग्रामसभा को संबोधित करते हुए बिन्द्रानवागढ़ विधायक जनक ध्रुव ने कहा कि आदिवासी समाज के पूर्वज हजारों वर्षों से जंगलों में निवास करते आए हैं। जंगल ही उनकी संस्कृति, परंपरा, पहचान और आजीविका का आधार हैं। ऐसे में उन्हें जंगल से अलग करने का अर्थ उनकी संस्कृति और अस्तित्व पर चोट पहुंचाना है।उन्होंने कहा कि जल, जंगल और जमीन की रक्षा करने वाले स्थानीय लोगों को बेदखल करने के बजाय उन्हें पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क और बिजली जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई जानी चाहिए। जो लोग पीढ़ियों से इस क्षेत्र में रहकर जंगल और वन्यजीवों की रक्षा करते आए हैं, उनके अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती।विधायक ध्रुव ने नाइट कर्फ्यू और शाम के समय राष्ट्रीय राजमार्ग पर नाका लगाए जाने से होने वाली परेशानियों का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि शाम 6 से 7 बजे के बाद आवागमन में बाधा आने से हजारों ग्रामीणों को इलाज और अन्य आपात परिस्थितियों में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इस समस्या का व्यावहारिक समाधान जरूरी है।उन्होंने कहा कि क्षेत्र की समस्याओं को लेकर वे पहले भी विधानसभा में आवाज उठाते रहे हैं और आगे भी ग्रामीणों के अधिकारों की लड़ाई जारी रखेंगे। आगामी विधानसभा सत्र में इन मुद्दों को प्रमुखता से उठाया जाएगा।
ये भी पढ़े :गरियाबंद में नक्सलियों के छिपे डंप का खुलासा, टिफिन IED और 4 UBGL राउंड बरामद
‘जनता मेरा परिवार, परिवार के साथ अन्याय नहीं होने दूंगी’
सिहावा विधायक अंबिका मरकाम ने वन विभाग और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि स्थानीय आदिवासी परिवार पीढ़ियों से जंगलों में निवास करते आए हैं। उनकी परंपराओं और संरक्षण के प्रयासों के कारण ही जल, जंगल, जमीन और वन्यजीव सुरक्षित हैं। ऐसे लोगों को उनके ही घरों से बेदखल करने के प्रयास अन्यायपूर्ण और अस्वीकार्य हैं।उन्होंने ग्रामीणों से एकजुट रहने की अपील करते हुए कहा कि संगठन और एकता में ही असली शक्ति है। अधिकारों की रक्षा के लिए सभी को मिलकर संघर्ष करना होगा। उन्होंने कहा कि कुछ लोग या अधिकारी संगठन में फूट डालने का प्रयास कर सकते हैं, लेकिन ग्रामीणों को आपसी मतभेदों में उलझने के बजाय एकता बनाए रखनी चाहिए।विधायक मरकाम ने कहा कि क्षेत्र की जनता उनका परिवार है और वे अपने परिवार के साथ हमेशा खड़ी रहेंगी। आदिवासियों के अधिकारों और सम्मान से जुड़े मामलों में किसी भी प्रकार का अन्याय स्वीकार नहीं किया जाएगा।
बिजली, स्वास्थ्य, शिक्षा और राजस्व ग्राम का दर्जा देने की उठी मांग
महाग्रामसभा में शामिल आदिवासी नेताओं और सामाजिक प्रतिनिधियों ने कहा कि क्षेत्र के ग्रामीण लंबे समय से बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कई गांवों में बिजली और अन्य आवश्यक सुविधाओं की कमी है। स्वास्थ्य एवं शिक्षा के लिए ग्रामीणों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है, वहीं वनग्रामों को राजस्व ग्राम का दर्जा देने की मांग भी लंबे समय से लंबित है।संरक्षक मनोज साक्षी, अर्जुन नायक, टीकम नागवंशी, आदिवासी नेता महेंद्र नेताम, पुरन मेश्राम और दैनिक राम मंडावी सहित अन्य वक्ताओं ने कहा कि स्थानीय समुदाय जंगलों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता आया है। इसके बावजूद यदि उन्हीं लोगों को विस्थापन के नाम पर बेदखली का सामना करना पड़े, तो यह गंभीर चिंता का विषय है।वक्ताओं ने कहा कि क्षेत्र में आवागमन की समस्याओं के साथ-साथ बिजली, स्वास्थ्य, शिक्षा और सड़क जैसी सुविधाओं की कमी दूर करना जरूरी है। ग्रामीणों ने शासन-प्रशासन से मांग की कि उनकी समस्याओं का समयबद्ध समाधान किया जाए और पारंपरिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जाए।
बड़ी संख्या में शामिल हुए ग्रामीण और सामाजिक प्रतिनिधि
महाग्रामसभा में जल, जंगल, जमीन बचाओ संघर्ष समिति के अध्यक्ष सिरधन सोम, महासचिव रेवा देवदास, सचिव माखन सलाम, मनोज साक्षी, हिम्मत सिंह नेताम, टीकम नागवंशी, महेंद्र नेताम, दैनिक राम मंडावी, अर्जुन नायक, मंगल सिंह नाग, रवि नेताम, लक्ष्मण सिंह मरकाम, गोकुल नेताम, ईश्वरी नेताम, बुधराम मांझी, संतोष मरकाम, शंकरलाल नेताम, चिमनलाल, कृष्णा मंडावी, दिनाचंद मरकाम, निरमती नेताम, दुखियाबाई मरकाम, देवी सिंह नेताम, रमुला मरकाम, फूलमति नेताम, बुधुराम मरकाम, फूलचंद मरकाम, रेवती यादव, रामकृष्ण ध्रुव, गेंदु यादव और डीके यादव सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित रहे।
कार्यक्रम में विधायक जनक ध्रुव, विधायक अंबिका मरकाम, एसडीएम नेहा भेड़िया और नायब तहसीलदार भी शामिल हुए। महाग्रामसभा का संचालन पुरन मेश्राम ने किया। सुबह 11 बजे शुरू हुई सभा शाम 5 बजे तक चली।महाग्रामसभा के माध्यम से ग्रामीणों ने स्पष्ट संदेश दिया कि वे अपने पारंपरिक अधिकारों, सम्मान और बुनियादी सुविधाओं के लिए संगठित होकर संघर्ष जारी रखेंगे। अब सबकी निगाहें निर्धारित 60 दिनों की समय-सीमा में शासन-प्रशासन की ओर से उठाए जाने वाले कदमों पर टिकी हैं।




