धान की कटाई के बाद खेत खाली हो जाते हैं. अक्टूबर महीने में किसान इन खाली खेतों में टमाटर की फसल लगाते हैं. टमाटर की फसल कम समय में तैयार होती है और इससे किसानों को अच्छा मुनाफा होता है. लेकिन इस फसल में खरपतवार एक बड़ी समस्या बन जाते हैं. खरपतवार की वजह से पौधों को जरूरी पोषक तत्व और धूप नहीं मिल पाती, जिससे पैदावार पर असर पड़ता है. इसके अलावा निराई-गुड़ाई में किसानों को भारी खर्च भी करना पड़ता है. इस चुनौती से निपटने के लिए किसान रोपाई के समय ही बेहतर तैयारी कर सकते हैं और प्लास्टिक मल्चिंग तकनीक अपना सकते हैं.
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जिला उद्यान अधिकारी की सलाह
जिला उद्यान अधिकारी डॉ. पुनीत कुमार पाठक ने बताया कि अक्टूबर में रोपाई के बाद टमाटर की फसल के शुरुआती चरण में खरपतवार तेजी से बढ़ते हैं. यह मुख्य फसल के पौधों से पोषक तत्व, नमी और धूप छीन लेते हैं, जिससे पैदावार पर सीधा असर पड़ता है. उन्होंने कहा कि प्लास्टिक मल्चिंग तकनीक किसानों के लिए सबसे बेहतर समाधान है. यह तकनीक न केवल खरपतवारों के अंकुरण को रोकती है, बल्कि मिट्टी की नमी बनाए रखती है और तापमान को संतुलित करती है. डॉ. पाठक ने बताया कि इस तकनीक से किसानों की उपज में 50 से 60% तक बढ़ोतरी हो सकती है और फल की गुणवत्ता में भी सुधार होता है.
प्लास्टिक मल्चिंग के फायदे
प्लास्टिक मल्चिंग किसानों को दोहरा लाभ देती है. यह सबसे पहले एक भौतिक बाधा बनाकर खरपतवारों को उगने से रोकती है, जिससे निराई-गुड़ाई का खर्च कम होता है. दूसरा, यह मिट्टी में नमी लंबे समय तक बनाए रखती है, जिससे सिंचाई की आवश्यकता कम हो जाती है. अक्टूबर में टमाटर की रोपाई में सिल्वर या ब्लैक कलर की 25 से 30 माइक्रोन मोटी प्लास्टिक मल्च शीट का उपयोग सबसे अच्छा माना जाता है. किसान टमाटर के बेड तैयार करने के बाद सबसे पहले इस शीट को बिछाएं और फिर पौधों की रोपाई करें.
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ड्रिप इरिगेशन से बढ़ेगी उपज
डॉ. पाठक ने कहा कि प्लास्टिक मल्चिंग के साथ ड्रिप इरिगेशन का इस्तेमाल करना फसल के लिए और भी फायदेमंद है. इससे पानी और खाद का सही प्रबंधन होता है, जिससे टमाटर की गुणवत्ता बेहतर होती है और उत्पादन बढ़ता है. यह तकनीक किसानों को कम लागत में अधिक मुनाफा दिलाने में सहायक साबित हो सकती है. इस तरह, सही समय पर प्लास्टिक मल्चिंग अपनाकर किसान अपनी खेती को और ज्यादा लाभकारी बना सकते हैं.
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