सर्दी का सीजन है गुलाबी ठंड की जगह शीतलहर ने ले ली, विंटर ब्लूज का सीजन है जिसे सीजनल अफेक्टिव डिसऑर्डर भी कहते हैं छोटे और कम धुप वाले दिनों में मस्तिष्क में सेरोटोनिन { मुड को बेहतर बनाने वाला हार्मोन } के स्तर को कम कर देते हैं, जिससे चिंता और अवसाद के लक्षण बढ़ जाते हैं ,चिंतित और अवसाद से ग्रसित व्यक्ति व्यथित हो अपनी व्यथा कह उठता है,छत्तीसगढ़ी में कहावत है- लोढ़हा कहे मै महादेव के भाई ,ठंड में पूर्व मुख्यमंत्री का बयान आया की उनकी प्रधानमंत्री से तुलना न की जाए ,लब्बो लुवाब ये है की प्रधानमंत्री का व्यक्तित्व उनके व्यक्तित्व से तुलना करने लायक नहीं है? ठंड में धुप से दूरी बढ़ जाए तो बुद्धि भी दूरस्थ हो जाती है, चिंता ,अवसाद ,बुद्धि से दूरी में व्यक्ति सपनों में जीने लगता है, चना भी अपने को पेड़ समझ बरगद से तुलना करने लगता है ,शायद यही कर पूर्व मुख्यमंत्री महोदय अपनी छटपटाहट के उबार के रास्ते ढूढ़ रहे, जिनकी शुरुआत हार से हुई ,वों अजेय योद्धा से शब्द युद्ध करने की लालसा पाल रहे ,व्यक्तित्व को बड़ा करने के लिए खुद के व्यक्तित्व से शीर्षस्थ व्यक्तित्व की तुलना खुद ही कर रहे ,खुद को कितना बड़ा समझ रहे, खुदमे खुदाई को समाहित कर रहे, शालानायक, पंच का चुनाव हारने के बाद राजनीति करने के लिए पारिवारिक पृष्टभूमि का योगदान रहा ,विज्ञान की शिक्षा छोड़ कला को अंगीकार करने का भी तो कारण रहा, विधायकी हारे सांसदी तो तीन -तीन लोकसभा सीटों से हारे, अभी वाला तो पूर्व मुख्यमंत्री का रूतबा लेकर हारे,पांच साला मुख्यमंत्री के दौर में दाऊ दलाल गिरोह की उत्पति से उन्नति तक का काम आपने बखूबी किया।
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सरकार चली गई पर घपले घोटालों की फेहरिस्त अभी तक बंद नही हुई, ऐसा कोई विभाग नही जहां से आपने अपना भाग नही लिया, कर्मचारी से अधिकारी, व्यापारी ,नेता सबको दलाल का चोला ओढ़ाया, घोटालों की इतनी लंबी फेहरिस्त वाली सरकार के मुखिया थे आप, जिसकी चर्चा राष्ट्रीय नही अंतर्राष्ट्रीय थी ,अब तो तांत्रिक भी पैसा अंतर्राष्ट्रीय भेज रहा, क्या पता पूर्व कोषाध्यक्ष यहीं कहीं हो बसा ,ऐसे अद्भुत व्यक्तित्व की बानगी जिसमें सहयोगी से लेकर बेटे तक जेल की रवानगी ,दान देकर भूमि वापस लेने की एक नही कई कहानियां है । कवासी से पहले सदानंद के भी तो अधिकार छीने थे ,आदिवासियों से अदावत पुरानी, राम वन पथ गमन में भ्रष्टाचार, राम विरोधी सारे कार्यों में सहभागी, झूठे चुनावी वायदे, गंगा जलीय, शराब बंदी के इरादे सब थे दिखावे, एक ही बार में आपार बहुमत की सरकार को छत्तीसगढ़ की जनता ने उस पार कर दिया ,हास लोकप्रियता का नहीं विश्वास का था ,मुख्यमंत्री का पद तो गया लोगों ने सांसदी के लायक 28 किलोमीटर में नहीं समझा ,चने का पौधा बराबरी करने चला बरगद की ,क्या ये आप जैसे किसान को भी अच्छा लगा ? या फिर किसानी भी भूल गए हैं? जैसे अपने को भूल गए हैं।
दबंग और दंभी में अंतर होता है ,ये रोग ठंड में और बढ़ता है, अवसाद में याद नहीं रहा, तुलना आपको अपनी ही पार्टी के शिखर पुरुष से करनी थी एक नही कई गुण मिल जाते, हो सकता है पुरे 36 मिल जाते भूमि, घोटाले ,अभियोग पत्र में नामजदगी, जमानत सब में समानता है ,हार खातों में दर्ज है ,चांदी के चमचों से जिन्होंने निवाला खाया, वों सुखी रोटी का मर्म क्या जानें? एक बाबा तो दूसरा दाऊ है, राजा का दीवान कहे की उसने गरीबी देखी है, तो फिर राजा फक्कड़ और दीवान भुलक्कड़ हैं ,मालगुजारी कौन से गरीबी का द्योतक है? रंग तो काला और सफेद दोनों हैं पर क्या एक जैसी दोनों की तासीर और महत्ता है? दंभ में गलतियों का अहसास नहीं होता, काले को सफ़ेद बताने का दुस्साहस होता है, प्रख्यात और कुख्यात में सिर्फ उपसर्ग का अंतर होता है और यही उपसर्ग का अंतर शख्सियत की उपयोगिता और महत्ता का अंतर बताता है, कु और प्र को जोड़कर आप कुप्रथा चालू कर रहे ,नमक और शक्कर की बराबरी करवा रहे, कर्म और कुकर्म का अंतर सबको पता है ये आप कौन सा नया मंतर मार रहे, उड़ता पंजाब सुना था ये उड़ता छत्तीसगढ़ क्यों बना रहे ? अपने व्यक्तित्व का खुद क्यों मजाक उड़ा रहे ?युद्ध भूमि में तो श्री राम और रावण ,श्री कृष्ण और दुर्योधन भी आमने -सामने खड़े थे, लड़े थे , वों कर्मों का प्रतिफल था ? कर्मों का हिसाब होता है ,कुकर्मों की सजा मिलती है, देव इन जीवन लीलाओं से बंधे रहे तो मानव बंधन कैसे तोड़ लेगा? हाँ अपने मुंह मिया मिट्ठू बनने की अकारथ कोशिश कर सकता है ।
चोखेलाल
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मुखिया के मुखारी व्यवस्था पर चोट करती चोखेलाल की टिप्पणी



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