घटती ठंड के साथ ही खेतों में नई फसलों की तैयारी का सही समय शुरू हो जाता है. फरवरी के अंत और मार्च की शुरुआत में मौसम ऐसा हो जाता है. जो कई लाभकारी फसलों के लिए बेहद अनुकूल माना जाता है. अगर किसान इस समय सही पौधों का चयन कर लें तो मार्च से ही तुड़ाई शुरू कर अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं.
धीरे धीरे ठंड घटती जा रही है. ऐसे मे किसान कुछ फसलें ऐसी हैं, जिसका बिछरा बसंत पंचमी के बाद से तैयार कर सकता है. यानी किसान अगेती खेती करके मार्च-अप्रैल तक अच्छा खासा मुनाफा कमा सकता है. आईये देवघर के कृषि वैज्ञानिक से जानते हैं कि जनवरी के अंतिम दिनों मे किसान किस फसल का बिछरा तैयार कर सकते हैं.
फरवरी-मार्च का समय सब्जी उत्पादकों के लिए सुनहरा अवसर होता है. अगर किसान मौसम को ध्यान में रखकर सही किस्म और वैज्ञानिक तरीके अपनाएं, तो कम समय में अधिक उत्पादन और बेहतर मुनाफा कमा सकते हैं.
खीरा कम समय में तैयार होने वाली फसल है और बाजार में इसकी मांग हमेशा बनी रहती है. बुवाई के 35 से 40 दिनों में तुड़ाई शुरू हो जाती है, जिससे किसान जल्दी नकद आमदनी हासिल कर सकते हैं. किसान खीरे की अगेती खेती कर मार्च मे अच्छा खासा मुनाफा कमा सकते हैं.
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दूसरा लाभकारी पौधा तोरई यानी झींगा है. घटती ठंड में तोरई की बेल तेजी से बढ़ती है और उत्पादन अच्छा मिलता है. होटल, ढाबों और शहरों में इसकी खपत अधिक होने के कारण किसानों को बेहतर दाम मिलता है. उसमे से अगर किसान अगेती खेती कर ले तो दोगुना मुनाफा कमा सकता है.
तीसरे नंबर पर भिंडी है. यह ऐसी सब्जी है. जो कम लागत में ज्यादा मुनाफा देती है. मार्च में भिंडी की पहली तुड़ाई शुरू हो जाती है और लगातार उत्पादन मिलता रहता है. सही देखभाल से इसकी पैदावार काफी बढ़ाई जा सकती है. शुरुवाती दिनों मे भिंडी 100 रूपए किलो तक बाजारों में मिलती है. इसलिए अगर किसान अभी से भिंडी की खेती पर धयान दें तो मार्च मे अच्छा खासा मुनाफा कमा सकते हैं.
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चौथा पौधा लौकी का है. लौकी की खेती गर्मी की शुरुआत में बहुत फायदेमंद मानी जाती है. इसकी बेल जल्दी फैलती है और फल लगातार आते हैं. मंडियों में इसकी कीमत स्थिर रहती है, जिससे किसान को नुकसान का खतरा कम रहता है.
पांचवां और अहम पौधा करेला है. करेला औषधीय गुणों से भरपूर होता है और शहरी बाजारों में इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है. घटती ठंड में इसकी बुवाई करने से उत्पादन बेहतर होता है और गुणवत्ता भी अच्छी मिलती है.
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