बिलासपुर :शादी का झांसा देकर बनाए गए संबंध हर परिस्थिति में दुष्कर्म नहीं माने जा सकते। इस अहम टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने सरगुजा की युवती द्वारा दर्ज कराए गए मामले में आरोपी की अपील स्वीकार करते हुए निचली अदालत की सजा को रद्द कर दिया और उसे बरी कर दिया।
मामले में सरगुजा निवासी युवती ने लीना राम के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई थी। शिकायत में कहा गया कि जब वह 12वीं में पढ़ रही थी, उसी दौरान आरोपी से परिचय हुआ और 8 सितंबर 2000 से 14 अप्रैल 2004 के बीच उसने शादी का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाए। पुलिस ने जांच के बाद मामला अदालत में पेश किया था। सत्र न्यायालय ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए धारा 376 के तहत 7 वर्ष की सजा और 5000 रुपए अर्थदंड दिया था।
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सहमति के पहलू पर हाईकोर्ट की टिप्पणी
सजा के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि कथित घटना के समय पीड़िता की उम्र लगभग 26 वर्ष थी और वह बालिग थी। ऐसे में उसे शारीरिक संबंधों के परिणाम का ज्ञान था। अदालत ने कहा कि अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि आरोपी ने शुरुआत से ही विवाह का कोई इरादा नहीं रखा था और केवल शारीरिक संबंध बनाने के उद्देश्य से संबंध स्थापित किए थे। इस आधार पर ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई दोषसिद्धि को गलत और गैर-कानूनी मानते हुए रद्द कर दिया गया।
एफएसएल और मेडिकल रिपोर्ट में पुष्टि नहीं
सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि पीड़िता ने बयान में स्वीकार किया था कि परीक्षा के बाद दोनों अलग-अलग अपने घर चले गए थे और माह की 15 व 30 तारीख को मिला करते थे। वह कुछ समय आरोपी के घर भी रही। एफएसएल रिपोर्ट और मेडिकल जांच में भी दुष्कर्म की पुष्टि नहीं हुई। रिपोर्ट दर्ज कराने में देरी के स्पष्ट कारण भी सामने नहीं आए
दो दशक बाद मिला राहत
मामले में एफआईआर के बाद आरोपी को 27 अगस्त 2004 को गिरफ्तार किया गया था। 23 अगस्त 2005 को सत्र न्यायालय ने सजा सुनाई थी। इसके बाद आरोपी 23 जनवरी 2006 से जमानत पर था। करीब दो दशक बाद हाईकोर्ट के फैसले से उसे दोषमुक्ति मिली।



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