बिहार के ग्रामीण अंचलों में कृषि अब केवल जीवनयापन का साधन नहीं, बल्कि नवाचार का केंद्र बनती जा रही है. इसका ताजा उदाहरण पेश किया है महिला किसान सुनैना देवी ने, जिन्होंने अपनी सूझबूझ से खेती की पारंपरिक परिभाषा को नई दिशा दी है. सुनैना देवी ने एक ही भूखंड पर ‘1/4’ तकनीक अपनाते हुए आलू, धनिया, मक्का, साग और सरसों की मिश्रित खेती (इंटरक्रॉपिंग) की है.जहां आमतौर पर किसान एक मौसम में एक ही मुख्य फसल पर निर्भर रहते हैं, वहीं उनका यह प्रयोग कम लागत में अधिक मुनाफे का सफल मॉडल बनकर उभरा है. उनके खेत की हरियाली आसपास के क्षेत्रों में चर्चा का विषय बनी हुई है.
इस खेती की सबसे बड़ी खासियत इसका बेहतरीन समय प्रबंधन है. सुनैना देवी बताती हैं कि भले ही पांचों फसलें एक साथ बोई गई हैं, लेकिन उनकी कटाई अलग-अलग चरणों में होती है. सबसे पहले आलू तैयार होता है और उसकी खुदाई की जाती है.
इसके बाद धनिया और सरसों की कटाई होती है. जब ये फसलें खेत से हट जाती हैं, तब तक मक्का को बढ़ने के लिए पर्याप्त जगह मिल चुकी होती है और अंत में उसकी फसल तैयार होती है. इस तरह खेत पूरे सीजन खाली नहीं रहता और अलग-अलग समय पर उपज मिलती रहती है.
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आर्थिक दृष्टि से यह मॉडल बेहद लाभकारी साबित हो रहा है. सुनैना देवी के अनुसार, इस पद्धति से परंपरागत खेती की तुलना में कई गुना अधिक फायदा होता है. सामान्य खेती में खाद, पानी और निराई-गुड़ाई का खर्च एक ही फसल पर होता है, लेकिन यहां वही संसाधन पांच फसलों में उपयोग हो रहे हैं.इससे लागत कम होती है और मुनाफा चार से पांच गुना तक बढ़ सकता है. एक ही जमीन से लगातार आय होना छोटे और मध्यम किसानों के लिए आर्थिक मजबूती का बड़ा साधन बन सकता है.
सुनैना देवी का यह प्रयास साबित करता है कि सही तकनीक, योजना और धैर्य के साथ खेती को लाभकारी बनाया जा सकता है. मिश्रित खेती से मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है, क्योंकि अलग-अलग फसलें अलग-अलग पोषक तत्वों का उपयोग करती हैं. साथ ही बाजार के जोखिम भी कम होते हैं.यदि एक फसल का भाव कम हो जाए, तो दूसरी फसल उसकी भरपाई कर देती है. उनकी सफलता को देखकर आसपास के किसान भी इस मॉडल को अपनाने के लिए प्रेरित हो रहे हैं, जो भविष्य में कृषि क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव का संकेत है.



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