छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण से जुड़े कानून को लेकर दो दशक पुरानी कहानी एक बार फिर चर्चा में है. साल 2006 में तत्कालीन सरकार द्वारा लाया गया धर्म स्वातंत्र्य संशोधन विधेयक अब 2026 में फिर से राजनीतिक और कानूनी बहस के केंद्र में आ गया है.
यह सिर्फ एक बिल की वापसी नहीं है, बल्कि यह उस पूरे सिस्टम की समीक्षा है, जो राज्य में जबरन या प्रलोभन के जरिए होने वाले धर्मांतरण को रोकने के लिए बनाया गया था. 20 साल पहले तैयार किया गया यह कानून उस समय की जरूरतों के हिसाब से कड़ा माना गया था, लेकिन बदलते समय और नए तरीकों ने इसे फिर से अपडेट करने की जरूरत पैदा कर दी है.
दरअसल, 2006 का यह कानून राज्य में लागू तो हुआ, लेकिन समय के साथ इसके कई प्रावधान सीमित माने जाने लगे. अब 2026 में राज्यपाल द्वारा इसे पुनर्विचार के लिए विधानसभा को लौटाना इस बात का संकेत है कि सरकार पुराने ढांचे को नए सिरे से मजबूत करना चाहती है. मौजूदा सरकार ने पहले ही एक नया ड्राफ्ट तैयार कर लिया है, जिसमें सजा को और सख्त करने और डिजिटल माध्यमों से होने वाले कथित धर्मांतरण को भी कानून के दायरे में लाने की तैयारी है. इस कदम को जहां सरकार सुरक्षा से जोड़कर देख रही है, वहीं विपक्ष इसे स्वतंत्रता के अधिकार से जोड़कर सवाल खड़े कर रहा है.
पुराने बिल में क्या था?
धर्म स्वातंत्र्य संशोधन विधेयक, 2006 एक कानून का प्रस्ताव था जिसे रमन सरकार ने छत्तीसगढ़ में लाया था. इसका मकसद राज्य में जबरन, धोखे से या लालच देकर कराए जाने वाले धर्म परिवर्तन (मतांतरण) को रोक लगाना था. इस विधेयक में ऐसे मामलों के लिए सख्त सजा और कानूनी कार्रवाई का प्रावधान किया गया था, ताकि लोगों की धार्मिक स्वतंत्रता सुरक्षित रहे और किसी पर दबाव डालकर धर्म न बदला जा सके.
क्यों फिर चर्चा में आया पुराना बिल
2026 में राज्यपाल द्वारा इस बिल को पुनर्विचार के लिए लौटाने के बाद यह फिर सुर्खियों में आ गया है. यह कदम पुराने कानून की सीमाओं और नई परिस्थितियों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है.
नए विधेयक में क्या-क्या होंगे बदलाव
राज्य सरकार ने नए धर्म स्वातंत्र्य विधेयक का ड्राफ्ट तैयार किया है. इसमें अवैध धर्मांतरण पर 7 से 10 साल तक की सजा का प्रस्ताव है. सामूहिक धर्मांतरण के मामलों में आजीवन कारावास तक का प्रावधान रखा गया है. डिजिटल माध्यमों से होने वाले प्रलोभन को भी इसमें शामिल किया गया है.
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राजनीतिक टकराव तेज
इस मुद्दे पर सत्ता और विपक्ष आमने-सामने हैं. सरकार इसे आदिवासी समाज की सुरक्षा और जबरन धर्मांतरण रोकने का कदम बता रही है. वहीं विपक्ष इसे धार्मिक स्वतंत्रता पर असर डालने वाला कानून बता रहा है.
आदिवासी क्षेत्रों में असर का सवाल
छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल इलाकों में यह कानून हमेशा संवेदनशील मुद्दा रहा है. सरकार के मुताबिक, नए प्रावधान इन क्षेत्रों में सामाजिक संतुलन बनाए रखने में मदद करेंगे.
आखिर 20 साल में क्यों बदली जरूरत
2006 में जब यह कानून बना था, तब डिजिटल प्लेटफॉर्म का असर काफी सीमित था. अब सोशल मीडिया और ऑनलाइन नेटवर्क के जरिए असर डालने के नए तरीके सामने आए हैं. यही वजह है कि कानून को अपडेट करने की जरूरत महसूस की गई.
अब आगे क्या हो सकता है?
अब विधानसभा में इस नए विधेयक पर चर्चा होगी. पुराने बिल की रिव्यू के बाद नए कानून को फाइनल टच दिया जाएगा. इससे यह तय होगा कि आने वाले समय में राज्य में धर्मांतरण से जुड़े मामलों को किस तरह से कंट्रोल किया जाएगा.



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