टमाटर फटने का सबसे बड़ा कारण मिट्टी की नमी में अचानक उतार-चढ़ाव होना है. जब लंबे सूखे के बाद अचानक भारी सिंचाई की जाती है या बारिश होती है, तो फल के अंदर का हिस्सा छिलके की तुलना में तेजी से बढ़ता है, जिससे छिलका फट जाता है. इसे रोकने के लिए खेत में नमी का स्तर हमेशा एक समान बनाए रखना जरूरी है.
बेहतर उत्पादन के लिए सिंचाई का एक निश्चित अंतराल तय करें. हल्की और नियमित सिंचाई करना सबसे बेहतर है. ड्रिप सिंचाई तकनीक सिंचाई करें तो ज्यादा बेहतर होगा. क्योंकि यह जड़ों को निरंतर नमी देगी. गर्मी के मौसम में शाम के समय पानी देना अधिक फायदेमंद होता है ताकि वाष्पीकरण कम हो और नमी बनी रहे.
फलों के फटने के पीछे पोषक तत्वों, विशेषकर बोरॉन की कमी एक मुख्य वजह होती है. बोरॉन कोशिका भित्ति को मजबूती देती है. इसकी कमी दूर करने के लिए बोरेक्स का 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें. यह प्रयोग फूल आने और फल बनने की अवस्था में करने से फलों की चमक बढ़ती है और वे फटते नहीं हैं.
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मिट्टी की नमी को संरक्षित करने के लिए मल्चिंग करें. प्लास्टिक मल्च या पुआल की मल्चिंग करने से मिट्टी का तापमान नियंत्रित रहता है और पानी का वाष्पीकरण धीरे होता है. इससे भारी बारिश या सिंचाई के दौरान भी जड़ें अचानक अधिक पानी नहीं सोखतीं, जिससे फलों के फटने की संभावना 80% तक कम हो जाती है और खरपतवार भी नियंत्रित रहते हैं.
टमाटर की अच्छी गुणवत्ता के लिए कैल्शियम नाइट्रेट का उपयोग बहुत प्रभावी रहेगा. कैल्शियम की कमी से न केवल फल फटते हैं, बल्कि 'ब्लॉसम एंड रॉट' यानि फल के निचले हिस्से में सड़न पैदा होती है. संतुलित मात्रा में कैल्शियम और पोटाश का उपयोग करने से फलों का आकार सुडौल होता है, उनका रंग गहरा लाल आता है और भंडारण क्षमता में भी सुधार होता है.
अच्छे उत्पादन के लिए ऐसी किस्मों का चयन करें जो फटने के प्रति प्रतिरोधी हों. खासकर हाइब्रिड किस्में बेहतर मानी जाती हैं. क्योंकि ये अधिक लचीली होती हैं और उनका छिलका थोड़ा मोटा होता है, जिससे वे प्रतिकूल परिस्थितियों में भी सुरक्षित रहती हैं. बुवाई करते समय हमेशा विशेषज्ञ की सलाह लें और क्षेत्र के लिए संस्तुत किस्म को ही लगाएं.
फलों को पूरा लाल होने से थोड़ा पहले ही तोड़ लेना चाहिए, खासकर जब मौसम खराब होने की आशंका हो. समय पर तुड़ाई करने से पौधों पर भार कम होता है और नए फूलों के लिए ऊर्जा बचती है. साथ ही, पौधों की समय-समय पर छंटाई और उन्हें सहारा देने से फलों का संपर्क मिट्टी से नहीं होता, जिससे संक्रमण का खतरा कम रहता है.



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