जिले के मझौलिया प्रखंड के बनकट मुसहरी गांव निवासी कृषक एवं शांभवी बायोटेक के संस्थापक रविकांत पांडे बताते हैं कि अमरूद के पौधों में वर्ष में तीन बार फूल और फल आते हैं. पहली बार फरवरी-मार्च में फूल लगते हैं और जून-जुलाई में फल आना शुरू होता है.
दूसरी बार जून-जुलाई में फूल आते हैं, जिनके फल सर्दियों में तैयार होते हैं. तीसरे चरण को ‘हस्त बहार’ कहा जाता है, जिसमें सर्दियों में फूल लगते हैं और बसंत ऋतु में फल तैयार होते हैं.
विशेषज्ञों के अनुसार पौधा रोपण के बाद पहली बार अधिक मात्रा में फल लेना उचित नहीं होता. इससे न तो पौधे की सेहत अच्छी रहती है और न ही फलों की गुणवत्ता बेहतर होती है. इसलिए पहली बार जब फूलों के बाद फल बनने लगें तो उनकी समय पर प्रूनिंग (छंटाई) कर देनी चाहिए.
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इससे छोटे पौधों पर अधिक भार नहीं पड़ता और वे झुकने या टूटने से बच जाते हैं. वर्तमान मौसम में पहली बार फूल निकलने की शुरुआत होती है, इसलिए किसानों को सिंचाई और छंटाई पर विशेष ध्यान देना चाहिए.
पौधे के संतुलित विकास के लिए मुख्य तने से केवल तीन से चार प्राथमिक शाखाएं ही रखनी चाहिए. यह भी ध्यान रखना चाहिए कि कोई शाखा दूसरी शाखा के ठीक ऊपर या नीचे न हो. यदि एक शाखा दूसरी पर छाया डालेगी तो नई फसल केवल ऊपरी हिस्से में ही आएगी और निचली शाखाएं कमजोर रह जाएंगी.
इसके अलावा छंटाई के बाद कटे हुए स्थान पर बुझा हुआ चूना, कॉपर सल्फेट और पानी के मिश्रण का लेप लगाना चाहिए, ताकि संक्रमण से बचाव हो सके. विशेषज्ञों का मानना है कि वैज्ञानिक तरीके से देखभाल करने पर अमरूद की खेती किसानों के लिए अधिक लाभदायक साबित हो सकती है.



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