धमतरी : शहर के मराठापारा स्थित मंदर माई मंदिर अपनी अद्भुत और रहस्यमयी परंपरा के कारण श्रद्धालुओं के बीच विशेष आस्था का केंद्र बना हुआ है। यहां देवी-देवताओं के विग्रह पूरे वर्ष झांपी (टोकरी) में विश्राम करते हैं और केवल नवरात्र के नौ दिनों में ही दर्शन के लिए बाहर निकाले जाते हैं।यह अनोखी परंपरा करीब दो शताब्दियों से भी ज्यादा समय से सतत चली आ रही है, जो इसे जिले के अन्य मंदिरों से अलग पहचान दिलाती है।
मंदिर में विराजित मंदर माई, मढ़िया देव और लंगूर देव के विग्रह की चैत्र नवरात्र की शुभ तिथि पर ज्योत प्रज्वलित कर विधिवत पूजा-अर्चना प्रारंभहोती है, जो लगातार नौ दिनों तक चलती है। इसी दौरान झांपी में विराजमान देव विग्रहों को बाहर निकालकर श्रद्धालुओं के दर्शन हेतु स्थापित किया जाता है। अष्टमी के हवन के पश्चात पुनः विधिपूर्वक विग्रहों को झांपी में स्थापित कर दिया जाता है।
ये भी पढ़े :मुखिया के मुखारी - पैसा सबसे ज्यादा जरुरी है
विसर्जन शोभायात्रा बनती है आकर्षण का केंद्र
प्रत्येक वर्ष भव्य विसर्जन शोभायात्रा निकाली जाती है, जिसमें पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज के बीच श्रद्धालु उत्साहपूर्वक शामिल होते हैं। मार्ग में विभिन्न स्थानों पर 'बाना लेकर भक्त अपनी आस्था प्रकट करते हैं। यह प्रक्रिया क्वांर नवरात्र में ज्यादा भव्य होती है। वहीं चैत्र नवरात्र में सीमित श्रद्धालुओं की उपस्थिति में शीतला तालाब में विसर्जन संपन्न कराया जाता है। मंदर माई मंदिर की यह अनूठी परंपरा न केवल गहरी धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि धमतरी की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को भी जीवंत बनाए रखने का सशक्त माध्यम बनी हुई है।
परंपरा में समाहित है आदिवासी आस्था
क्वांर नवरात्रि की पंचमी तिथि को चकमक पत्थर से जोत प्रज्वलित करने की परंपरा आज भी जीवंत है। विजयादशमी के बाद देव विग्रहों को पुनः विश्राम के लिए झांपी में रखा जाता है, जहां वे अगले नवरात्र तक विराजमान रहते हैं। इस प्रकार वर्ष में केवल दो बार ही भक्तों को दर्शन का अवसर मिलता है। मंदिर के पुजारी राजकुमार ध्रुव के अनुसार यह परंपरा लगभग 200 वर्षों से चली आ रही है और वर्तमान में चौथी पीढ़ी द्वारा विधिवत सेवा की जा रही है। यहां पूजा-पाठ, जप-तप, आरती, भोग, भंडारा और विसर्जन आदि सभी अनुष्ठान आदिवासी परंपराओं के अनुरूप संपन्न होते हैं।
देशभर से पहुंचते हैं श्रद्धालु
मंदर माई मंदिर में नवरात्र के दौरान हजारों की संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। छत्तीसगढ़ के अलावा महाराष्ट्र, मुंबई, ओडिशा, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश से भी भक्त यहां जोत जलाने और मनोकामना पूर्ण करने की आस्था लेकर आते हैं।



Comments