बिलासपुर : अमेरी रोड स्थित नारायण टेक्नो स्कूल को लेकर सामने आए दस्तावेज़ एक ऐसी तस्वीर सामने रखते हैं, जहां हर नई परत के साथ व्यवस्था और गहरी होती नजर आती है। यह मामला अब किसी एक अनियमितता तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एक ऐसे बहुस्तरीय ढांचे की ओर इशारा करता है, जिसमें शिक्षा, आर्थिक गतिविधियां और प्रशासनिक शिथिलता एक साथ जुड़ी दिखाई देती हैं।करीब एक दशक पहले डॉल्फिन स्कूल को लेकर उठे विवाद की यादें ताजा होती हैं, लेकिन उपलब्ध रिकॉर्ड यह दर्शाते हैं कि वर्तमान मॉडल कई स्तरों पर उससे आगे निकल चुका है।
स्कूल में CBSE पैटर्न के अनुरूप पढ़ाई कराई जा रही है, जबकि दस्तावेज़ों में यह स्पष्ट होता है कि उसी स्तर की मान्यता उपलब्ध नहीं है। आठवीं तक की मान्यता के सवाल के बीच छात्रों को उसी पैटर्न में आगे बढ़ाया जाना सीधे तौर पर उनके शैक्षणिक भविष्य को अनिश्चितता में डालता है। बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए यह स्थिति केवल तकनीकी नहीं, बल्कि करियर को प्रभावित करने वाला गंभीर मुद्दा बनती है।
फीस स्कूल की नहीं, सीधे NSPIRA के खातों
दस्तावेज़ यह स्थापित करते हैं कि अभिभावकों द्वारा जमा की जाने वाली फीस सीधे नारायण टेक्नो स्कूल के खाते में न जाकर NSPIRA से जुड़े बाहरी खातों—नेल्लौर और मुंबई—तक पहुंचती है।
यह व्यवस्था शिक्षा के नाम पर एक ऐसे वित्तीय नेटवर्क की ओर इशारा करती है, जो स्थानीय निगरानी से बाहर संचालित होता है। अभिभावकों को यह भरोसा दिलाया जाता है कि वे स्कूल में फीस जमा कर रहे हैं, जबकि रिकॉर्ड इसके उलट तस्वीर पेश करते हैं।
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NSPIRA : सिस्टर कंसर्न से व्यापारिक नियंत्रण
हासिल दस्तावेज़ों के अनुसार NSPIRA एक व्यावसायिक इकाई के रूप में नारायण एजुकेशन सोसाइटी से जुड़ी हुई है और उसी के माध्यम से यूनिफॉर्म, किताबें और अन्य सामग्री की आपूर्ति का केंद्रीकृत सिस्टम संचालित होता है।
यह कंपनी न तो राज्य में विधिवत पंजीकृत दिखाई देती है, न ही इसका स्थायी संचालन ढांचा स्पष्ट रूप से सामने आता है। इसके बावजूद प्रदेश के रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग और भिलाई स्थित सभी स्कूलों में इसी के माध्यम से सामग्री की आपूर्ति और बिक्री होती है।
फर्जी पते, बंद ऑफिस और जारी रसीदें
रिकॉर्ड में दर्ज पते और वास्तविक स्थिति के बीच भी अंतर सामने आता है। सिटी मार्केटिंग ऑफिस के रूप में उपयोग किया गया स्थान मार्च 2025 में बंद हो चुका है, लेकिन उसी पते का उपयोग अब भी रसीदों में जारी है।यह स्थिति अभिभावकों के सामने भ्रम की स्थिति पैदा करती है और वित्तीय लेन-देन की पारदर्शिता पर सीधा सवाल खड़ा करती है।
निर्धारित विक्रेता, किट की मजबूरी,आर्थिक बोझ
जानकारी के अनुसार यूनिफॉर्म और किताबों की खरीद के लिए निर्धारित विक्रेताओं से ही सामग्री लेने का दबाव बनाया जाता है। कई मामलों में आवश्यकता के विपरीत पूरी किट खरीदने की स्थिति बनती है।
एकाधिकार आधारित यह व्यवस्था न केवल विकल्पों को सीमित करती है, बल्कि निम्न गुणवत्ता की सामग्री ऊंचे दामों पर खरीदने के लिए भी मजबूर करती है।
स्कूल परिसर बना स्टोरेज, डिस्ट्रीब्यूशन सेंटर
दस्तावेज़ यह भी दर्शाते हैं कि विद्यालय परिसर का उपयोग कई मामलों में स्टोरेज और डिस्ट्रीब्यूशन सेंटर के रूप में किया जा रहा है। शाखा स्तर पर सामग्री का वितरण और विक्रेताओं को आपूर्ति स्कूल के भीतर से ही संचालित होती है।
यह स्थिति साफ संकेत देती है कि शैक्षणिक ढांचा सीधे तौर पर एक व्यावसायिक वितरण प्रणाली का हिस्सा बन चुका है।
कर्मचारियों के अधिकारों पर भी असर, PF-ESI
कर्मचारियों के PF और ESI से जुड़े रिकॉर्ड यह दिखाते हैं कि ये प्रक्रियाएं स्थानीय स्तर के बजाय बाहरी संस्थानों—नेल्लौर और मुंबई—से जुड़ी हैं।
ऐसी स्थिति में किसी भी कानूनी विवाद या अधिकार से जुड़े मामले में कर्मचारियों को राज्य से बाहर जाना पड़ सकता है, जो उनके अधिकारों को जटिल बनाता है।
नियमों के खिलाफ, नॉन-प्रॉफिट ढांचे का दुरुपयोग
शिक्षा संस्थानों के लिए तय नियम स्पष्ट करते हैं कि उन्हें नॉन-प्रॉफिट मॉडल पर संचालित होना चाहिए और किसी भी व्यावसायिक गतिविधि से दूर रहना अनिवार्य है।
लेकिन उपलब्ध दस्तावेज़ यह संकेत नहीं, बल्कि स्पष्ट करते हैं कि यहां शैक्षणिक संरचना का उपयोग एक केंद्रीकृत व्यापारिक मॉडल को चलाने के लिए किया जा रहा है। यह हितों के टकराव और नियामकीय उल्लंघन की स्थिति को सामने लाता है।
जिला शिक्षा विभाग पर सबसे बड़ा सवाल
इतने व्यापक दस्तावेज़ और स्पष्ट तथ्य सामने आने के बाद भी जिला शिक्षा विभाग की ओर से ठोस कार्रवाई का अभाव सबसे बड़ा प्रश्न बनकर उभरता है।
यह स्थिति यह संकेत देती है कि निगरानी तंत्र या तो निष्क्रिय है या फिर इस पूरे मामले में अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखाई गई। शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में यह चुप्पी अपने आप में बड़ा सवाल बन जाती है।
शिक्षा का केंद्र या संगठित व्यापार— टालना मुश्किल
नारायण टेक्नो स्कूल से जुड़ा यह पूरा मामला अब केवल एक संस्था का नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता का सवाल बन चुका है। दस्तावेज़ों में सामने आई परतें यह स्पष्ट करती हैं कि यदि समय रहते निष्पक्ष और कठोर कार्रवाई नहीं हुई, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान उन बच्चों और अभिभावकों को होगा, जिन्होंने शिक्षा के नाम पर इस व्यवस्था पर भरोसा किया है।



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