चैत्र नवरात्र के नौ दिनों में अलग-अलग दिन देवी दुर्गा के अलग-अलग स्वरूप की पूजा-अर्चना करने का विधान है। वैदिक पंचांग के अनुसार, आज यानी 25 मार्च को चैत्र नवरात्र का सातवां दिन है। इस दिन मां कालरात्रि की पूजा होती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, मां कालरात्रि की साधना और व्रत करने से भय और नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति मिलती है और शुभ फल की प्राप्ति होती है।
अगर आप भी मां कालरात्रि की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं, तो पूजा के दौरान मां कालरात्रि की कथा का पाठ जरूर करें। ऐसा माना जाता है कि कथा का पाठ करने से जीवन में सुख-शांति बनी रहती है और मां कालरात्रि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। आइए पढ़ते हैं मां कालरात्रि की कथा।
मां कालरात्रि कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन समय में शुंभ और निशुंभ नाम के राक्षस थे। उन्होंने तीनों लोकों में हाहाकार मचा रखा था। देवी-देवता ने परेशान होकर उनसे रक्षा के लिए मां दुर्गा की पूजा की। इस युद्ध एक रक्तबीज नाम का राक्षस था। उसने अपनी शक्ति से सभी को डरा रखा था। राक्षस को वरदान प्राप्त था कि उसके रक्त की एक बूंद धरती पर गिरने से उसी के समान एक और शक्तिशाली राक्षस उत्पन्न होगा। इसके बाद जब मां दुर्गा ने रक्तबीज को मारना शुरू किया, तो उस दौरान उसके रक्त की बूंदों से लाखों राक्षस उत्पन्न हो गए।
ये भी पढ़े :मुखिया के मुखारी - पैसा सबसे ज्यादा जरुरी है
ऐसे में मां दुर्गा ने मां कालरात्रि को उत्पन्न किया। मां कालरात्रि के बाल खुले और बिखरे हुए हैं, जो उनके उग्र और स्वतंत्र रूप को दर्शाते हैं। तीन विशाल नेत्र हैं। उन्होंने रक्तबीज पर प्रहार किया। जब उसके रक्त की बूंद धरती पर गिरने लगी, तो मां कालरात्रि ने उस रक्त को अपनी मुख के अंदर ले ली। इस तरह मां कालरात्रि ने रक्तबीज का संहार किया। धार्मिक मान्यता के अनुसार, मां कालरात्रि की साधना करने से साधक को सभी भय से मुक्ति मिलती है और शत्रुओं का नाश होता है।
मां कालरात्रि स्तोत्र
हीं कालरात्रि श्री कराली च क्लीं कल्याणी कलावती।
कालमाता कलिदर्पध्नी कमदीश कुपान्विता॥
कामबीजजपान्दा कमबीजस्वरूपिणी।
कुमतिघ्नी कुलीनर्तिनाशिनी कुल कामिनी॥
क्लीं हीं श्रीं मन्त्वर्णेन कालकण्टकघातिनी।
कृपामयी कृपाधारा कृपापारा कृपागमा॥
मां कालरात्रि कवच
ऊँ क्लीं मे हृदयं पातु पादौ श्रीकालरात्रि।
ललाटे सततं पातु तुष्टग्रह निवारिणी॥
रसनां पातु कौमारी, भैरवी चक्षुषोर्भम।
कटौ पृष्ठे महेशानी, कर्णोशंकरभामिनी॥
वर्जितानी तु स्थानाभि यानि च कवचेन हि।
तानि सर्वाणि मे देवीसततंपातु स्तम्भिनी॥
मां कालरात्रि के मंत्र
1. ॐ क्रीं क्रीं क्रीं हूँ हूँ ह्रीं ह्रीं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं क्रीं हूँ हूँ ह्रीं ह्रीं स्वाहा॥
2. ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रुं ह्रुं क्रीं क्रीं क्रीं दक्षिणकालिके क्रीं क्रीं क्रीं ह्रुं ह्रुं ह्रीं ह्रीं॥
3. ॐ ह्रुं ह्रुं क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं दक्षिणकालिके ह्रुं ह्रुं क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं स्वाहा॥
4. ॐ क्रीं क्रीं क्रीं ह्रुं ह्रुं ह्रीं ह्रीं दक्षिणकालिके स्वाहा॥



Comments