महासमुंद: 15वें वित्त आयोग की राशि में गड़बड़ी, ग्रामीणों ने उठाए सवाल

महासमुंद: 15वें वित्त आयोग की राशि में गड़बड़ी, ग्रामीणों ने उठाए सवाल

महासमुंद :  जिले के पिथौरा ब्लॉक अंतर्गत ग्राम पंचायत सागुनढाप में वित्तीय अनियमितता का गंभीर मामला सामने आया है। ग्रामीणों ने पंचायत में 15वें वित्त आयोग के तहत मिली राशि के दुरुपयोग और नियमों की अनदेखी का आरोप लगाते हुए कलेक्टर से लिखित शिकायत की है। शिकायत के अनुसार पंचायत में बिना पूर्ण विवरण के कोरे बिल-बाउचरों के आधार पर राशि आहरित की गई है। दस्तावेजों में सामग्री, मात्रा और दर जैसी आवश्यक जानकारी खाली पाई गई, जबकि कुल भुगतान राशि स्पष्ट रूप से अंकित है। इस तरह की प्रक्रिया को वित्तीय नियमों का खुला उल्लंघन माना जा रहा है।

ग्रामीणों का कहना है कि सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त दस्तावेजों में 10 जून 2024 का एक बिल सामने आया, जिसकी राशि 1 लाख 50 हजार रुपए दर्शाई गई है, लेकिन बिल में आवश्यक विवरण दर्ज नहीं हैं। इसके बावजूद उक्त बिल के आधार पर संबंधित फर्म को भुगतान कर दिया गया। इससे पूरे मामले में गंभीर संदेह उत्पन्न हो गया है। मामले में पंचायत सचिव सुभाषचन्द्र साहू ने सफाई देते हुए कहा कि 15वें वित्त आयोग के तहत जनपद निधि से कचरा शेड निर्माण जैसे कार्यों के लिए लगभग 3 लाख रुपए स्वीकृत हुए थे। उनके अनुसार बिल में “प्रिंट मिस्टेक” के कारण विवरण दर्ज नहीं हो पाया और बिल कोरा रह गया।

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वहीं ठेकेदार मोहितराम पटेल ने बताया कि उसने सचिव को कोरा बिल दिया था, लेकिन ऐसा बिल सूचना के अधिकार के तहत उपलब्ध नहीं कराया जाना चाहिए था। इससे यह संकेत मिलता है कि दस्तावेजों के रखरखाव और पारदर्शिता में भी गंभीर लापरवाही बरती गई है। इस मामले में करारोपण अधिकारी सुशील चौधरी ने भी महत्वपूर्ण जानकारी दी। उन्होंने बताया कि जब भी पंचायत सचिव से निरीक्षण के लिए दस्तावेज मांगे गए, तो वे अधूरे होने का हवाला देकर उन्हें टालते रहे। इससे संदेह और गहरा हो गया है कि कहीं न कहीं नियमों को जानबूझकर नजरअंदाज किया गया है।

तीनों पक्षों के अलग-अलग बयानों से पूरे मामले की स्थिति और अधिक संदिग्ध हो गई है। बिना पूर्ण विवरण और वैध दस्तावेज के भुगतान करना वित्तीय अनुशासन के खिलाफ है और यह भ्रष्टाचार की श्रेणी में आ सकता है। ग्रामीणों ने इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराने और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि यदि समय रहते ऐसे मामलों पर रोक नहीं लगाई गई, तो पंचायत स्तर पर विकास कार्यों में पारदर्शिता खत्म हो जाएगी और सरकारी योजनाओं का लाभ आम जनता तक नहीं पहुंच पाएगा। अब देखना होगा कि जिला प्रशासन इस मामले में क्या कदम उठाता है और क्या जांच के बाद दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होती है या नहीं। फिलहाल यह मामला पंचायत स्तर पर वित्तीय प्रबंधन और जवाबदेही पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है।









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