आखिरकार सरकार को अपने उस आदेश को वापस लेना ही पड़ा जिसके तहत विभिन्न सार्वजनिक वितरण तंत्र के माध्यम से 'फोर्टिफाइड' चावल के वितरण को अनिवार्य किया गया था. इस बात के कोई प्रमाण थे नहीं कि इस तरह तैयार चावल रक्त-अल्पता (एनीमिया) से लड़ने में कारगर है.आईआईटी खड़गपुर की एक रिपोर्ट में इनके भंडारण को मानव स्वास्थ्य के लिए घातक बताया गया था.
भारत में केंद्रीय पूल में चावल का कुल भंडार लगभग 679.32 लाख टन तक पहुंच गया है, जो कि निर्धारित बफर मानदंड, लगभग 76.1 लाख टन, से नौ गुना अधिक है. इसके बावजूद सार्वजनिक वितरण प्रणाली में 'फोर्टिफाइड' यानी संवर्धित चावल के वितरण को अनिवार्य कर दिया जाना कई सवाल खड़े कर रहा था. देश में सभी सार्वजनिक वितरण दुकान और आंगनवाड़ी आदि में कोई 350 लाख मीट्रिक टन फोर्टिफाइड चावल के वितरण की व्यवस्था की गई थी.
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कहा तो यह गया कि चावल के दानों में कृत्रिम रूप से लौह तत्व और विटामिन मिलाकर देश की एक बड़ी आबादी को 'छिपी हुई भूख' से मुक्त किया जा सकता है, किंतु इस महत्वाकांक्षी योजना के पीछे छिपे स्वास्थ्य जोखिम और निर्माण प्रक्रिया की अनिश्चितता अब गंभीर विमर्श का विषय बन गई है. यही नहीं, न तो इसके कोई वैज्ञानिक प्रमाण हैं और न ही प्रायोगिक नतीजे.
महज पायलट प्रोजेक्ट की आड़ में सारे देश में सार्वजनिक वितरण प्रणाली में इस चावल को डालने से बड़ी आबादी पर संकट के बादल भी मंडरा रहे हैं और यह बात न तो वितरण करने वाला जानता है और न ही खाने वाला. सबसे पहले टूटे हुए चावल के दानों को पीसकर आटा बनाया जाता है. इस आटे में आयरन (लोहा), फोलिक एसिड और विटामिन बी12 का एक निर्धारित मिश्रण मिलाया जाता है. इसमें जिंक, विटामिन ए , बी 1, बी 2, बी 3 और बी 6 भी मिलाते हैं. मिश्रण में पानी मिलाकर इसे एक 'एक्सट्रूडर' मशीन में डाला जाता है, जो इसे ठीक चावल के दाने जैसा आकार देती है. इन्हें फोर्टिफाइड राइस कर्नेल कहा जाता है. अंत में, इन कृत्रिम दानों को सामान्य चावल के साथ 1:100 के अनुपात में मिलाया जाता है. यानी 100 किलो सामान्य चावल में एक किलो फोर्टिफाइड दाना होता है.
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईसीएमआर) के विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि इस तरह के चावल सभी के लिए एकसमान लाभकारी नहीं हैं. खासकर थैलेसीमिया और सिकल सेल एनीमिया जैसी आनुवंशिक बीमारियों से पीड़ित लोगों के लिए. ऐसे मरीजों के शरीर में पहले से ही आयरन की अधिकता होती है, और आयरन युक्त चावल खाने से उनके अंगों के खराब होने का खतरा बढ़ सकता है. यह बात सरकारी रिपोर्ट में दर्ज है कि सरकार ने पायलट प्रोजेक्ट्स की विफलता को छिपाया.
मानव आंतों में करोड़ों 'अच्छे बैक्टीरिया' होते हैं जो पाचन और प्रतिरक्षा प्रणाली के लिए जिम्मेदार हैं. शोध बताते हैं कि जब हम 'सिंथेटिक आयरन' (कृत्रिम लोहा) का अधिक सेवन करते हैं तो वह पूरी तरह अवशोषित नहीं हो पाता. बचा हुआ लोहा आंतों में हानिकारक बैक्टीरिया (जैसे ई-कोलाई) की वृद्धि में सहायक होता है, जिससे लाभकारी बैक्टीरिया नष्ट हो जाते हैं.



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