नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने रविवार को ट्रुथ सोशल पर गालियों से भरी एक पोस्ट शेयर की, जिसमें उन्होंने ईरान को धमकी देते हुए मंगलवार को उसके पावर प्लांट पर हमला करने की बात कही।अमेरिका ने जब 28 फरवरी के इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर हमला किया था, तब वे अपनी जीत को लेकर काफी आश्वास्त थे। लेकिन अब अमेरिका इस युद्ध में ईरान के जाल में फंसता नजर आ रहा है।
ईरान के जाल में फंसे ट्रंप
अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध का आज 38वां दिन है, लेकिन अभी भी ये युद्ध रुकता नजर नहीं आ रहा है।
राष्ट्रपति ट्रंप ने हाल ही में कई बार दावा किया कि उनकी ईरान में कई अधिकारियों के साथ युद्ध खत्म करने को लेकर बातचीत चल रही है, लेकिन ईरानी सरकार ने हर बार अमेरिकी राष्ट्रपति के दावे को खारिज किया।
अमेरिका अब इस युद्ध में कई मोर्चों पर चल रही लड़ाई में फंसा हुआ दिख रहा है, जहां से निकलने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा।
अमेरिका एक ऐसे युद्ध को सही ठहराने की कोशिश भी कर रहा है, जिसकी वजह से अमेरिकी टैक्स देने वालों पर रोजाना लगभग 900 मिलियन अमेरिकी डॉलर का बोझ पड़ रहा है और जिसने दुनिया को एक लंबे समय तक चलने वाले ऊर्जा संकट में फंसा दिया है।
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अमेरिका ये भी दावा करता रहा है कि उसने ईरान के युद्ध लड़ने की क्षमता को खत्म कर दिया है, लेकिन ईरान की तरफ से अभी भी इजरायल और खाड़ी देशों पर हमले जारी हैं।
ईरान के पास अभी भी काफी बैलिस्टिक मिसाइल की क्षमता है और माना जाता है कि उसके पास 400-440 किलोग्राम समृद्ध यूरेनियम का भंडार है।
ईरान ने अब अमेरिका को अपनी मर्जी से कहानी तय करने के बजाय, बस हालात पर प्रतिक्रिया देने के लिए मजबूर कर दिया है।
युद्ध से बाहर निकलना चाहता है अमेरिका
अमेरिका ईरान के एक ऐसे जाल में फंस गया है, जिसमें ईरान इस युद्ध को अपनी तरह से चला रहा है। ईरान रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण रास्तों (चोकपॉइंट्स) तैयार कर रहा है, ताकि अमेरिका के लिए बिना अपनी राजनीतिक साख खोए, यानी बिना कमजोर दिखे, युद्ध से पीछे हटना या बाहर निकलना मुश्किल हो जाए।
ईरान का पहला कदम- ईरान ने इसे मोजेक सिद्धांत कहा। इसका मतलब यह था कि अमेरिका ईरान के शासन को तोड़ नहीं सकता था।
ईरान ने इस युद्ध में खामेनेई, लारीजानी और नौसेना प्रमुख अलीरेजा तंगसिरी जैसे कई वरिष्ठ अधिकारियों को खो दिया था, जिससे ईरान की लीडरशिप में बड़े-बड़े खाली स्थान (gaping holes) पैदा हो गए।
ईरान के मोजेक सिद्धांत ने उन खाली स्थानों को तेजी से भर दिया। खामेनेई, लारीजानी और तंगसिरी की जगह नए अधिकारियों को दी गई। इसके साथ ही शासन और IRGC अपना काम करते रहे।
ईरान का दूसरा कदम- ईरान ने अमेरिका को एक थका देने वाले युद्ध में धकेल दिया, जिससे US को बड़ा आर्थिक नुकसान हुआ।
ईरान इस युद्ध में पश्चिम एशिया में मिसाइलों के सबसे बड़े और सबसे अलग जखीरे के साथ उतरा, जिसमें नई हाइपरसोनिक फत्ताह सीरीज भी शामिल थी। लेकिन तेहरान ने शुरुआती दिनों में इनमें से ज्यादातर मिसाइलों को रोककर रखा।
ईरान ने अमेरिकी की बड़ी-बड़ी मिसाइलों के जवाब में सस्ते और बड़े पैमाने पर बने शाहिद और कामिकेज ड्रोन की बौछार कर दी, जिनका निशाना अमेरिका और इजरायल के सैन्य अड्डे, साथ ही खाड़ी देशों के नागरिक और ऊर्जा से जुड़े बुनियादी ढांचे थे।
ईरान ने अमेरिका को इन मिसाइलों को रोकने के लिए इंटरसेप्टर पर लाखों डॉलर खर्च करने पर मजबूर कर दिया। ईरान ने अमेरिकी इंटरसेप्शन को एक महंगा सौदा बना दिया।
पारंपरिक सैन्य सिद्धांत के अनुसार, किसी एक आने वाले खतरे को रोकने के लिए दो-तीन इंटरसेप्टर दागने की सलाह दी जाती है। लेकिन एक 'पैट्रियट' इंटरसेप्टर की कीमत 40 लाख अमेरिकी डॉलर है और एक 'THAAD' इंटरसेप्टर की कीमत लगभग 1 करोड़ 20 लाख अमेरिकी डॉलर है। वहीं, एक 'शाहिद' ड्रोन की अधिकतम कीमत 50,000 अमेरिकी डॉलर है।
ईरान का तीसरा कदम- ईरान का सबसे जरूरी कदम स्ट्रेट ऑफ होर्मुज। इस रास्ते को निशाना बनाकर अमेरिका पर दबाव बढ़ाया जा सकता था।
ईरान का होर्मुज स्ट्रेट के जरिए अमेरिका पर दबाव दिखावटी नहीं था, बल्कि असली साबित हुआ। इसका असर भी अमेरिका में देखने को मिल रहा है।
अमेरिका में ईंधन की कीमतें 4 डॉलर प्रति गैलन से ज्यादा हो गईं, जो 2022 के बाद सबसे ज्यादा पर पहुंच गई हैं। यूरोप में पेट्रोल और डीजल की कीमतें 15-17 प्रतिशत बढ़ गईं,और कुछ अफ्रीकी और एशियाई देशों में तो 34 प्रतिशत से भी ज्यादा बढ़ गई हैं।
होर्मुज से दुनिया की समुद्री रास्ते से आने वाली कच्चे तेल की सप्लाई का करीब 20 फीसद हिस्सा गुजरता है। ईरान के इस रास्ते से जहाजों की आवाजाही रोकना या उसे धीमा भी कर देने से ट्रंप और अमेरिका पर दुनियाभर से दबाव बहुत ज्यादा बढ़ गया।
इससे अमेरिका के सहयोगी भी उससे दूर हो गए। ट्रंप ने होर्मुज को जबरदस्ती खुलवाने के लिए दूसरे देशों ने आगे आने की बात कही थी और उन देशों से युद्ध में शामिल होने के लिए भी कहा था, लेकिन इस युद्ध में शामिल होने के लिए ब्रिटेन और फ्रांस समेत सभी देशों ने मना कर दिया।


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