होर्मुज में US नाकाबंदी के बीच चीन की ‘स्लो एंट्री’! क्या है ड्रैगन की असली रणनीति?

होर्मुज में US नाकाबंदी के बीच चीन की ‘स्लो एंट्री’! क्या है ड्रैगन की असली रणनीति?

 नई दिल्ली :  इस्लामाबाद में शांति वार्ता के विफल होने के बाद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में अमेरिका की सख्त नाकेबंदी ने पश्चिम एशिया के तनाव को और बढ़ा दिया है।इस कदम का असर सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं है, बल्कि चीन जैसे बड़े देश पर भी पड़ सकता है, जो ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीदार है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या चीन भी इस संघर्ष में अप्रत्यक्ष रूप से शामिल हो सकता है।

अमेरिका ने होर्मुज में ईरान से जुड़े सभी जहाजों पर व्यापक नाकेबंदी लागू कर दी है। अमेरिकी केंद्रीय कमान के अनुसार, यह नाकेबंदी किसी एक देश तक सीमित नहीं है, बल्कि ईरान के सभी बंदरगाहों से आने-जाने वाले हर जहाज पर लागू होगी।

पहले जहां ईरान कुछ 'दोस्त' देशों के जहाजों को गुजरने की अनुमति दे रहा था, वहीं अब अमेरिका ने पूरी तरह से नियंत्रण कड़ा कर दिया है। इससे समुद्री व्यापार पर बड़ा असर पड़ने की आशंका है। इस कदम का सबसे ज्यादा असर चीन-ईरान व्यापार पर पड़ सकता है, क्योंकि चीन ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीदार है और दोनों देशों के बीच गहरे आर्थिक संबंध हैं।

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चीन-ईरान रिश्ते कितने मजबूत हैं?

चीन, ईरान के तेल निर्यात का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा खरीदता है। ईरान को इससे हर साल लगभग 31.2 अरब डॉलर की आय होती है, जो उसकी अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

ईरान के सरकारी बजट का लगभग 45 प्रतिशत हिस्सा इसी तेल व्यापार से आता है, जिसमें चीन की बड़ी भूमिका है। यानी अगर यह व्यापार प्रभावित होता है, तो ईरान की आर्थिक स्थिति पर सीधा असर पड़ेगा।

2021 में चीन और ईरान के बीच 25 साल का एक बड़ा समझौता हुआ था, जिसकी कुल कीमत लगभग 400 अरब डॉलर बताई जाती है। इस समझौते के तहत चीन को लगातार तेल की आपूर्ति मिलती है और बदले में वह निवेश और सुरक्षा सहयोग देता है।

तेल व्यापार और छूट का खेल

चीन ईरान से सस्ता तेल खरीदता है। उसे प्रति बैरल 8 से 10 डॉलर तक की छूट मिलती है। यही वजह है कि चीन के लिए ईरान का तेल बेहद फायदेमंद है। 2025 में चीन ने करीब 14 लाख बैरल प्रतिदिन ईरानी तेल आयात किया, जो उसके कुल आयात का लगभग 12 प्रतिशत है।

यह आंकड़ा दिखाता है कि चीन की ऊर्जा जरूरतों में ईरान की बड़ी भूमिका है। हालांकि ईरान पर कई अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लगे हुए हैं, इसलिए दोनों देशों के बीच असली व्यापार का पूरा डेटा सार्वजनिक नहीं होता। फिर भी यह साफ है कि चीन इस व्यापार में सबसे आगे है।

अमेरिका को क्यों है चिंता?

अमेरिका का मानना है कि चीन, प्रतिबंधों के बावजूद ईरान के साथ व्यापार जारी रखे हुए है। एक रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में चीन ने आधिकारिक तौर पर करीब 9.96 अरब डॉलर का व्यापार दिखाया, लेकिन इसमें ईरानी तेल का असली आंकड़ा शामिल नहीं है।

अगर तेल व्यापार को जोड़ दिया जाए, तो यह कुल व्यापार का 75 प्रतिशत से ज्यादा हो सकता है। यही कारण है कि अमेरिका इस संबंध को कमजोर करना चाहता है। अमेरिका का यह भी दावा है कि चीन, ईरान को ड्रोन और हथियार कार्यक्रमों के लिए जरूरी तकनीक तक पहुंच दिलाने में मदद करता है। इसके लिए वह हांगकांग और अन्य देशों में शेल कंपनियों का इस्तेमाल करता है।

चीन पर आरोप और ट्रंप की चेतावनी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने चीन को चेतावनी दी है कि अगर उसने ईरान की सैन्य मदद की, तो उस पर 50 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया जा सकता है। अमेरिका का यह भी आरोप है कि चीन ईरानी तेल के असली स्रोत को छुपाता है। वह इसे मलेशिया, ओमान या यूएई से आया हुआ दिखाता है, ताकि प्रतिबंधों से बचा जा सके।

तेल की ढुलाई के लिए ‘शैडो फ्लीट’ यानी पुराने जहाजों का इस्तेमाल किया जाता है, जो अपनी पहचान छुपाने के लिए झंडे बदलते हैं, ट्रैकिंग सिस्टम बंद कर देते हैं और समुद्र में जहाज से जहाज में तेल ट्रांसफर करते हैं।

क्या चीन युद्ध में शामिल हो सकता है?

फिलहाल चीन सीधे तौर पर इस युद्ध में शामिल नहीं है, लेकिन उसके आर्थिक हित ईरान से जुड़े हुए हैं। अगर अमेरिका की नाकेबंदी लंबे समय तक जारी रहती है, तो चीन के लिए यह बड़ा झटका हो सकता है। ऐसी स्थिति में चीन कूटनीतिक या आर्थिक स्तर पर ईरान का समर्थन बढ़ा सकता है, लेकिन सीधे सैन्य हस्तक्षेप की संभावना अभी कम मानी जा रही है।








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