परमेश्वर राजपूत, गरियाबंद/छुरा : राज्य सरकार भले ही राजस्व विभाग के डिजिटलीकरण और पारदर्शिता के बड़े-बड़े दावे कर रही हो, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट नजर आ रही है। छुरा क्षेत्र में सामने आए ताजा मामलों ने राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि विभाग के कुछ अधिकारी-कर्मचारी “पैसे के खेल” में इस कदर लिप्त हैं कि बिना “पूजा-पाठ” (रिश्वत) के आम किसानों का सही काम भी वर्षों तक लटका दिया जाता है, जबकि गलत काम आसानी से निपटा दिए जाते हैं।
आदिवासी महिला के नाम पर फौती और 20 लाख का लोन!
छुरा क्षेत्र के ग्राम कुड़ेरादादर में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां एक आदिवासी महिला की बिना जानकारी के उसकी जमीन का फौती दर्ज कर दिया गया। इतना ही नहीं, उसी के नाम पर करीब 20 लाख रुपये का लोन भी पास हो गया। इस पूरे मामले की जानकारी महिला को काफी समय बाद लगी, जिससे वह और उसका परिवार गहरे सदमे में है।
जमीन हेराफेरी का खेल: आधी जमीन दूसरे के नाम
वहीं ग्राम हीराबतर में एक आदिवासी किसान की जमीन के साथ बड़ा खेल किया गया। आरोप है कि उसकी आधी जमीन पिछड़ा वर्ग के व्यक्ति के नाम पर रजिस्ट्री और नामांतरण कर दी गई, जबकि बाकी आधी जमीन अब भी मूल किसान के नाम पर है। इस तरह के मामलों से यह सवाल उठता है कि आखिर बिना जांच-पड़ताल के ऐसे नामांतरण कैसे हो रहे हैं।
ऑडियो-वीडियो में रिश्वत मांगने के आरोप
कोसमी क्षेत्र के एक पटवारी का ऑडियो-वीडियो भी सामने आया है, जिसमें वह किसान से जमीन बिक्री की नकल और नक्शा काटने के नाम पर पैसे मांगते हुए यह कह रहा है कि “तहसीलदार साहब और आरआई को भी पैसा देना पड़ता है।” इस कथित सबूत ने राजस्व विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर कर दिया है।
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कलेक्टर के आदेश के बिना भी हो रही रजिस्ट्री
क्षेत्र में कई ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जहां कलेक्टर की अनुमति के बिना जमीन की रजिस्ट्री संभव नहीं थी, लेकिन “सेवा-पानी” के बाद न केवल बिक्री की प्रक्रिया पूरी कर दी गई बल्कि रजिस्ट्री भी कर दी गई। यह सीधे-सीधे नियमों की अवहेलना और मिलीभगत की ओर इशारा करता है।
3 साल से भटक रहा किसान, नहीं मिला न्याय
ग्राम हीराबतर के एक किसान की पीड़ा भी कम नहीं है। अपनी पुश्तैनी जमीन का रकबा सुधार कराने के लिए वह पिछले तीन वर्षों से तहसील और अनुविभागीय कार्यालय के चक्कर काट रहा है।
किसान के अनुसार उसकी जमीन का रकबा 0.45 हेक्टेयर था, जो अचानक घटकर 0.35 हेक्टेयर हो गया, जबकि पड़ोसी किसान का रकबा बढ़ गया।पीड़ित किसान ने भू-अभिलेख शाखा गरियाबंद से पुराने दस्तावेज लाकर तहसील कार्यालय में आवेदन किया, लेकिन एक साल से अधिक समय तक पेशी के बाद मामला खारिज कर दिया गया और खारिज करने का कोई ठोस कारण भी नहीं बताया गया। इसके बाद अनुविभागीय कार्यालय भेजा गया, जहां दो साल तक सुनवाई के बाद फिर केस खारिज कर कलेक्टर कार्यालय का रास्ता दिखा दिया गया।अब हताश किसान भूख हड़ताल पर बैठने की तैयारी में है।
डिजिटल दावे बनाम जमीनी सच्चाई
सरकार द्वारा राजस्व विभाग के ऑनलाइन और डिजिटल सिस्टम को पारदर्शिता का माध्यम बताया जा रहा है, लेकिन छुरा क्षेत्र के ये मामले दर्शाते हैं कि सिस्टम में सुधार के दावे अभी भी कागजों तक सीमित हैं। जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार, देरी और मनमानी जारी है।
बड़ा सवाल: कब लगेगी लगाम?
लगातार सामने आ रहे ऐसे मामलों ने आम जनता, खासकर किसानों का भरोसा डगमगा दिया है। सवाल यह उठता है कि आखिर राजस्व विभाग में चल रहे इस “खेल” पर कब लगाम लगेगी? क्या सरकार इस दिशा में सख्त कदम उठाएगी या फिर किसान यूं ही न्याय के लिए भटकते रहेंगे?


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