बिलासपुर :इकलौती बेटी के असमय निधन के सदमे से उबरने के बाद एक दंपति ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर आईवीएफ के जरिए माता-पिता बनने की अनुमति मांगी थी। याचिका की सुनवाई के बाद छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने दंपित को आईवीएफ की इजाजत दे दी है। कोर्ट ने क्लिनिक को तत्काल आईवीएफ शुरू करने का निर्देश दिया है।
हाई कोर्ट ने एक अहम मामले में अपनी इकलौती संतान खोने वाली दंपति को 55 वर्ष की उम्र में आईवीएफ, इन विट्रो फर्टिलाइजेशन के जरिए दोबारा माता पिता बनने की अनुमति दी है। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद के सिंगल बेंच ने कहा, संतान सुख भी संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा है।
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छत्तीसगढ़ बिलासपुर, हाई कोर्ट कॉलोनी निवासी 49 वर्षीय महिला और उनके 55 वर्षीय पति ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी, दायर याचिका में कहा है, वर्ष 2022 में उनकी इकलौती बेटी का असामयिक निधन हो गया था, इस घटना से वे गहरे मानसिक और भावनात्मक सदमे में चले गए। त्रासदी से उबरने और खुद को दोबारा संभालने में उन्हें काफी वक्त लग गया। सदमे से उबरने के बाद उन्होंने फिर से परिवार शुरू करने का फैसला लिया और बिलासपुर स्थित एक निजी आईवीएफ सेंटर में परामर्श लिया। जांच के बाद डॉक्टरों ने उन्हें मेडिकल रूप से फिट पाया।
इसलिए चिकित्सक ने किया इंकार
चिकित्सकीय जांच के बाद यह पता चलने पर, पति फरवरी 2026 में 55 वर्ष की आयु पार कर चुके हैं। एआरटी, असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी एक्ट 2021 की धारा 21 (जी) के तहत पुरुष के लिए अधिकतम उम्र 55 वर्ष और महिला के लिए 50 वर्ष निर्धारित है। नियमों का हवाला देते हुए और तकनीकी आधार पर आईवीएफ सेंटर के डॉक्टरों ने इलाज शुरू करने से इनकार कर दिया था।
कोर्ट ने कहा- उम्र का नियम व्यक्तिगत, सामूहिक नहीं
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, संतान पाने का अधिकार व्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है। एआरटी कानून में उम्र की शर्त पति-पत्नी दोनों पर अलग-अलग लागू होती है। पत्नी 50 साल से कम और मेडिकल रूप से सक्षम है, इसलिए सिर्फ पति की ज्यादा उम्र के आधार पर उन्हें रोका नहीं जा सकता। कोर्ट ने बेटी की मृत्यु को विशेष परिस्थिति माना। क्लिनिक और चिकित्सक को तुरंत आईवीएफ शुरू करने और इलाज बीच में न रोकने का निर्देश दिया।


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