परमेश्वर राजपूत,गरियाबंद/छुरा : लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को मजबूत करने वाले पत्रकार यदि खुद ही असुरक्षित हों, तो यह व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। छुरा क्षेत्र के पत्रकार उमेश राजपूत की 23 जनवरी 2011 को हुई निर्मम हत्या के 15 वर्ष बीत जाने के बाद भी उनके परिवार को आज तक न्याय नहीं मिल पाया है। न्याय की उम्मीद लगाए बैठा परिवार अब भी भय और असुरक्षा के माहौल में जीवन यापन करने को मजबूर है।मामला यहीं तक सीमित नहीं है। मृतक पत्रकार के छोटे भाई, जो इस मामले में याचिकाकर्ता भी हैं, जिसे दो वर्ष पूर्व अज्ञात लोगों द्वारा घर पर पत्र डालकर जान से मारने की धमकी दी गई थी। इस गंभीर घटना की शिकायत थाना छुरा में दर्ज कराई गई, लेकिन हैरानी की बात है कि इतने समय बीत जाने के बाद भी पुलिस अब तक आरोपियों को पकड़ने में नाकाम रही है।
परिवार ने लगातार मिल रही धमकियों और सुरक्षा के अभाव को देखते हुए आत्मरक्षा के लिए जिला प्रशासन के समक्ष बंदूक लाइसेंस के लिए आवेदन किया था। लेकिन प्रशासन की सुस्त कार्यप्रणाली का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि दो साल बीत जाने के बाद भी इस आवेदन पर कोई निर्णय नहीं लिया गया है। इससे यह सवाल उठता है कि क्या जिला प्रशासन किसी बड़ी घटना का इंतजार कर रहा है?स्थानीय लोगों और पत्रकारों में इस मामले को लेकर भारी आक्रोश है। उनका कहना है कि जब एक पत्रकार के परिवार को ही सुरक्षा और न्याय नहीं मिल पा रहा है, तो आम नागरिकों की स्थिति का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।
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प्रशासन की चुप्पी पर सवाल
इस पूरे मामले में जिला प्रशासन की चुप्पी और निष्क्रियता कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है। एक ओर सरकार पत्रकार सुरक्षा और न्याय की बात करती है, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर ऐसे मामलों में लापरवाही सामने आ रही है।
परिवार की मांग
पीड़ित परिवार ने प्रशासन से मांग की है कि:
उमेश राजपूत हत्याकांड की निष्पक्ष जांच कर दोषियों को जल्द गिरफ्तार किया जाए।
धमकी देने वाले आरोपियों को तत्काल पकड़ा जाए।
लंबित बंदूक लाइसेंस आवेदन पर शीघ्र निर्णय लेकर परिवार को सुरक्षा प्रदान की जाए।
यह मामला केवल एक परिवार का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की संवेदनहीनता को उजागर करता है। यदि समय रहते प्रशासन ने ठोस कदम नहीं उठाए, तो यह लोकतंत्र की नींव को कमजोर करने वाला उदाहरण बन सकता है।


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