बिहार में खेती-किसानी का स्वरूप तेजी से बदल रहा है. अब युवा परंपरागत फसलों को छोड़कर फल और सब्जियों की आधुनिक खेती की ओर रुख कर रहे हैं. भागलपुर जिले में इन दिनों पपीते की खेती को लेकर युवाओं में जबरदस्त उत्साह देखा जा रहा है. पपीता कम समय में अधिक मुनाफा देने वाली फसल मानी जाती है. लेकिन सही तकनीक और सही किस्म के चुनाव के बिना इसमें भारी नुकसान की संभावना भी बनी रहती है.
कौन सी किस्म है सबसे बेहतर?
पपीते की खेती में अक्सर किसान रेड लेडी किस्म को सबसे अच्छा मानते हैं. लेकिन स्थानीय परिस्थितियों में यह धारणा हमेशा सही साबित नहीं होती. कृषि शोधकर्ता गुंजेश गुंजन के अनुसार गंगा के तटीय क्षेत्रों में पपीते की फसल में फंगस लगने का खतरा सबसे अधिक होता है. रेड लेडी जैसी हाइब्रिड किस्मों में बीमारियां अधिक पकड़ती हैं.
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गुंजेश गुंजन आगे सलाह देते हैं कि भागलपुर और इसके आसपास के इलाकों के लिए देसी सेगमेंट की किस्में सबसे अधिक लाभदायक हैं. इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं. देसी पपीते को हाइब्रिड की तुलना में अधिक समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है. हाइब्रिड के मुकाबले मार्केट में इसके दाम थोड़े कम जरूर मिलते हैं. लेकिन एक ही पौधे से मिलने वाली पैदावार इतनी अधिक होती है कि कुल कमाई हाइब्रिड से ज्यादा हो जाती है.
पानी का सही मेंटेनेंस है सफलता की कुंजी
पपीता एक ऐसी फसल है जहां पानी का प्रबंधन सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. जरा सी चूक पूरी फसल को बर्बाद कर सकती है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि पपीते के पौधों को न तो ज्यादा पानी चाहिए और न ही बहुत कम. अधिक सिंचाई से पपीते का स्वाद फीका पड़ जाता है. वह पानी जैसा लगने लगता है. पानी की कमी होने पर पौधे के पत्ते पीले पड़कर झड़ने लगते हैं.
ड्रिप सिंचाई, मिठास और ग्रोथ का राज
पपीते की खेती को सफल बनाने के लिए ड्रिप सिंचाई सबसे उत्तम तकनीक मानी गई है. यह तकनीक न केवल पानी बचाती है. बल्कि पौधों को जरूरत के अनुसार नमी प्रदान करती है. ड्रिप सिंचाई के उपयोग से फल अच्छी तरह ग्रो करते हैं. उनकी मिठास भी बनी रहती है.


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