हिन्दू धर्म में किसी भी शुभ काम की शुरुआत भगवान गणेश की पूजा से होती है। ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को एकदंत संकष्टी चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। जैसा कि नाम से ही साफ है, यह दिन भगवान गणेश के एकदंत स्वरूप को समर्पित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन व्रत रखने और इस तिथि की कथा सुनने या पढ़ने से जीवन की सभी बाधाएं दूर हो जाती हैं, तो आइए यहां एकदंत संकष्टी चतुर्थी की व्रत कथा का पाठ करते हैं।
एकदंत संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार भगवान परशुराम शिव जी से मिलने कैलाश पर्वत पहुंचे। उस समय भगवान शिव आराम कर रहे थे और गणेश जी द्वार पर पहरा दे रहे थे। जब परशुराम जी ने अंदर जाने का प्रयास किया, तो गणेश जी ने उन्हें अंदर जाने से रोक दिया। परशुराम जी स्वभाव से बहुत क्रोधी थे। बार-बार मना करने पर भी जब गणेश जी ने उन्हें भीतर जाने की अनुमति नहीं दी, तो दोनों के बीच युद्ध छिड़ गया। युद्ध के दौरान क्रोध में आकर परशुराम जी ने अपने दिव्य अस्त्र 'परशु' (फरसा) से गणेश जी पर प्रहार कर दिया। वह परशु स्वयं भगवान शिव ने परशुराम को प्रदान किया था।
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गणेश जी उस प्रहार को रोक सकते थे, लेकिन पिता द्वारा दिए गए अस्त्र का मान रखने के लिए उन्होंने वह प्रहार अपने दांत पर ले लिया। उस दिव्य अस्त्र के वार से गणेश जी का एक दांत टूट गया। तभी से उन्हें 'एकदंत' कहा जाने लगा। जब माता पार्वती को इस बारे में पता चला तो वे बेहद क्रोधित हुईं, लेकिन बाद में गणेश जी की उदारता और धैर्य को देखकर शांत हुईं। ऐसा कहा जाता है कि एकदंत संकष्टी चतुर्थी के दिन इस कथा का पाठ जरूर करना चाहिए, क्योंकि इसके बिना व्रत का फल अधूरा रहता है।
संकष्टी चतुर्थी का महत्व
संकष्टी चतुर्थी का मतलब है 'संकट को हरने वाली चतुर्थी'। बप्पा के एकदंत स्वरूप की पूजा करने से व्यक्ति को बुद्धि, धैर्य और सुख-शांति प्राप्ति होती है। यह व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए फलदायी है, जिनके कामों में बार-बार रुकावटें आ रही हैं।


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