सुशासन शिविर में फूटा जनता का गुस्सा: मंच से राजस्व विभाग पर रिश्वतखोरी के आरोप, कलेक्टर के सामने ग्रामीणों ने सुनाई पीड़ा

सुशासन शिविर में फूटा जनता का गुस्सा: मंच से राजस्व विभाग पर रिश्वतखोरी के आरोप, कलेक्टर के सामने ग्रामीणों ने सुनाई पीड़ा

परमेश्वर राजपूत, गरियाबंद/छुरा :गरियाबंद जिले के छुरा विकासखंड अंतर्गत ग्राम कनसिंघी में आयोजित सुशासन शिविर उस समय चर्चा का विषय बन गया, जब ग्रामीणों का गुस्सा खुले मंच पर फूट पड़ा। शिविर में जिले के कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक, विभिन्न विभागों के अधिकारी-कर्मचारी, जनप्रतिनिधि एवं बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित थे। शासन की योजनाओं और समस्याओं के समाधान के उद्देश्य से आयोजित इस शिविर में लोगों ने अपनी समस्याएं लेकर पहुंचना तो शुरू किया, लेकिन कई मामलों में खुद व्यवस्था पर ही गंभीर सवाल खड़े हो गए।शिविर के दौरान जिला पंचायत सदस्य लेखराज धुर्वा ने मंच से ही राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर तीखा हमला बोला। उन्होंने खुले शब्दों में आरोप लगाया कि छुरा तहसील कार्यालय में बिना लेनदेन कोई काम नहीं होता। आम ग्रामीणों को छोटे-छोटे कामों के लिए महीनों तक कार्यालयों के चक्कर काटने पड़ते हैं और रिश्वत नहीं देने पर फाइलें लंबित रखी जाती हैं। उन्होंने अधिकारियों को चेतावनी भरे लहजे में व्यवस्था सुधारने की बात कहते हुए कहा कि यदि हालात नहीं बदले तो जनता का आक्रोश और बढ़ेगा।

शिविर में एक मार्मिक दृश्य उस समय देखने को मिला जब कोठीगांव की वृद्ध महिला भुखई बाई नेताम अपनी समस्या लेकर पहुंची, लेकिन मंच पर कलेक्टर को बैठे देखकर बिना आवेदन दिए ही वापस लौट गई। बाद में महिला ने मीडिया से चर्चा करते हुए आरोप लगाया कि वह पहले भी अपनी समस्या लेकर जनदर्शन में कलेक्टर कार्यालय गई थी, जहां उसके साथ अभद्र व्यवहार किया गया। महिला ने कहा कि उसी अनुभव के कारण उसने दोबारा आवेदन देने से इंकार कर दिया। वृद्ध महिला की पीड़ा सुनकर मौके पर मौजूद कई ग्रामीणों ने भी प्रशासनिक व्यवहार पर नाराजगी जाहिर की।
इसी दौरान ग्राम कनसिंघी के उपसरपंच और अन्य ग्रामीण स्वास्थ्य विभाग से संबंधित समस्याओं को लेकर आवेदन देने पहुंचे थे। ग्रामीणों का आरोप है कि संबंधित विभागीय अधिकारी ने उनका आवेदन लेने से मना कर दिया। इस बात को लेकर मौके पर बहस की स्थिति बन गई और ग्रामीणों ने विरोध जताया। बाद में अन्य लोगों के हस्तक्षेप और दबाव के बाद आवेदन स्वीकार कर पावती दी गई।

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सुशासन शिविर में सामने आए इन घटनाक्रमों ने प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यशैली पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जब अधिकारियों की मौजूदगी वाले शिविर में भी लोगों को आवेदन देने और अपनी बात रखने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है, तो सामान्य दिनों में सरकारी दफ्तरों में आम जनता की स्थिति का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है।शासन द्वारा जनता की समस्याओं के त्वरित समाधान और पारदर्शी प्रशासन के उद्देश्य से सुशासन शिविर आयोजित किए जा रहे हैं, लेकिन कनसिंघी शिविर में जिस तरह से भ्रष्टाचार, अभद्र व्यवहार और आवेदन लेने में टालमटोल जैसे आरोप सामने आए, उसने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। अब देखना होगा कि इन शिकायतों और आरोपों पर जिला प्रशासन क्या कार्रवाई करता है।








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