ऋषि के श्राप से जब दासी पुत्र बने न्याय के देवता, पढ़िए महात्मा विदुर के जन्म की पूरी कथा

ऋषि के श्राप से जब दासी पुत्र बने न्याय के देवता, पढ़िए महात्मा विदुर के जन्म की पूरी कथा

महाभारत काल में नीति, धर्म और न्याय के ज्ञानी महात्मा विदुर की कहानी बेहद अनोखी है। शास्त्रों, वेदों और राजनीति के प्रकांड विद्वान होने के बावजूद विदुर कभी हस्तिनापुर के राजा नहीं बन सके। इसके पीछे एक ऋषि के भयंकर श्राप छिपा है, जिसके बारे में आज हम आपको बताने जा रहे हैं।

महाभारत में मिलती है यह कथा

महाभारत (आदि पर्व) के अनुसार, विदुर कोई साधारण व्यक्ति नहीं थे, बल्कि वे स्वयं न्याय के देवता यमराज के अवतार थे। एक श्राप के कारण उन्हें पृथ्वी लोक पर एक साधारण दासी के पुत्र के रूप में जन्म लेना पड़ा था। कथा के अनुसार, एक बार राजा के सैनिकों ने कुछ चोरों का पीछा करते हुए अनजाने में परम तपस्वी ऋषि माण्डव्य को भी चोर समझकर पकड़ लिया और उन्हें सूली पर चढ़ा दिया।

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अपनी योगशक्ति से ऋषि के प्राण तो बच गए, लेकिन उन्हें इस अन्याय पर बहुत क्रोध आया। वे सीधे यमराज के पास पहुंचे और पूछा "मैंने अपने जीवन में ऐसा कौन-सा अपराध किया था, जिसकी इतनी दर्दनाक सजा मुझे भुगतनी पड़ी?"

यमराज ने दिया ये जवाब

यमराज ने कर्मों का बहीखाता देखकर बताया कि जब आप बालक थे, तब आपने एक छोटे-से कीड़े की पूंछ में सुई चुभोई थी। यह उसी का फल है। इस पर ऋषि माण्डव्य क्रोधित हो उठे और बोले "बचपन में अज्ञानतावश किए गए एक छोटे से कार्य के लिए मुझे इतना बड़ा दंड दे दिया? मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि तुम्हें मृत्युलोक (धरती) पर एक दासी के गर्भ से जन्म लेना पड़ेगा।" इसी श्राप के कारण यमराज को विदुर के रूप में जन्म लेना पड़ा।

हस्तिनापुर पर मंडराया का संकट

सत्यवती और राजा शांतनु के पुत्र विचित्रवीर्य का विवाह अम्बिका और अम्बालिका से हुआ था, लेकिन बिना किसी संतान के ही विचित्रवीर्य की असमय मृत्यु हो गई। भीष्म पहले ही आजीवन ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा ले चुके थे, ऐसे में हस्तिनापुर के सिंहासन के सामने वंश का संकट खड़ा हो गया। तब माता सत्यवती ने अपने पहले पुत्र महर्षि वेदव्यास को याद किया और उनसे वंश की रक्षा के लिए अम्बिका और अम्बालिका से संतान उत्पन्न करने की आज्ञा दी।

इस तरह हुआ विदुर का जन्म

महर्षि वेदव्यास बेहद कठोर तपस्या करके लौटे थे, जिसके कारण उनका रूप अत्यंत तेजस्वी और डरावना दिखाई दे रहा था। जब बड़ी रानी अम्बिका वेदव्यास के सामने गईं, तो उसने वेद व्यास के भयानक स्वरूप को देखकर डर के मारे अपनी आंखें बंद कर लीं। इस कारण वेदव्यास ने कहा कि उनका पुत्र जन्म से ही नेत्रहीन (अंधा) होगा। इसी के फलस्वरूप धृतराष्ट्र का जन्म हुआ।

वहीं जब दूसरी रानी अम्बालिका की बारी आई, तो वह डर के मारे भय से पीली पड़ गईं। तब वेदव्यास ने कहा कि उनका पुत्र हमेशा शारीरिक रूप से कमजोर और रोग से ग्रसित रहेगा। इसी के फलस्वरूप पांडु का जन्म हुआ।

दो अस्वस्थ संतानें होने के डर से माता सत्यवती ने अम्बालिका को दोबारा भेजा, लेकिन रानी ने खुद न जाकर अपनी जगह अपनी चतुर दासी को भेज दिया। वह दासी महर्षि के तेज से बिल्कुल नहीं डरी और शांत मन से उनके सामने खड़ी रही। महर्षि वेदव्यास ने प्रसन्न होकर वरदान दिया कि इसके गर्भ से अत्यंत बुद्धिमान, नीतिवान और धर्म का ज्ञाता पुत्र पैदा होगा। यही पुत्र आगे चलकर महात्मा विदुर कहलाए।







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