आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ता ग्राम तंजरा, बकरी पालन बना स्वरोजगार का सशक्त माध्यम

आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ता ग्राम तंजरा, बकरी पालन बना स्वरोजगार का सशक्त माध्यम

कोरिया : पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग की जनहितकारी योजनाओं के प्रभावी अभिसरण से ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका संवर्धन और आत्मनिर्भरता की दिशा में उल्लेखनीय परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं। कोरिया जिले के जनपद पंचायत सोनहत अंतर्गत ग्राम तंजरा इसका एक प्रेरणादायक उदाहरण बनकर उभरा है, जहां आदिवासी परिवारों ने परंपरागत बकरी पालन को व्यवस्थित स्वरोजगार के रूप में अपनाकर आत्मनिर्भरता की नई राह बनाई है।

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के मूल मंत्र 'रोजगार से आजीविका' को साकार करते हुए ग्राम तंजरा के 50 पंजीकृत अकुशल आदिवासी श्रमिक परिवारों को बकरी पालन आधारित स्वरोजगार से जोड़ा गया है। मनरेगा और बिहान के संयुक्त प्रयासों से इन परिवारों को आर्थिक एवं संरचनात्मक सहायता उपलब्ध कराई गई, जिससे बकरी पालन अब केवल परंपरागत गतिविधि न रहकर एक संगठित व्यवसाय का रूप ले रहा है।

ग्राम तंजरा की लगभग 50 आदिवासी महिलाएं स्वयं सहायता समूहों से जुड़कर आत्मनिर्भरता की दिशा में अग्रसर हैं। बिहान की सहायता से इन महिलाओं के लिए मनरेगा के माध्यम से बकरी शेड का निर्माण कराया गया। साथ ही, सीएलएफ एवं सीआईएफ के माध्यम से प्राप्त ऋण की सहायता से महिलाओं ने उन्नत नस्ल के 10 हाइब्रिड बकरे खरीदे हैं।

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परंपरागत रुचि से मिली नई पहचान
वनांचल क्षेत्र सोनहत के अधिकांश आदिवासी परिवार वर्षों से बकरी पालन करते आ रहे हैं। ग्रामीणों की इसी पारंपरिक रुचि को स्वरोजगार के अवसर में बदलने के उद्देश्य से ग्राम पंचायत तंजरा का चयन किया गया। गांव के सभी 89 आदिवासी परिवार मनरेगा के तहत पंजीकृत श्रमिक हैं और बकरी पालन से जुड़े हुए हैं। इन्हें व्यवसायिक दृष्टिकोण से बकरी पालन अपनाने के लिए प्रेरित किया गया।

50 परिवारों को मिला स्वरोजगार का अवसर
विभाग तथा मनरेगा के सतत प्रयासों से 50 परिवारों को बकरी पालन को स्थायी स्वरोजगार के रूप में अपनाने के लिए प्रेरित किया गया। उनकी मांग के अनुरूप बकरी शेड स्वीकृत किए गए। मनरेगा के तहत प्रत्येक शेड निर्माण के लिए 1 लाख 49 हजार रुपये स्वीकृत किए गए तथा निर्माण कार्य में ग्रामीण सहभागिता सुनिश्चित करने हेतु ग्राम पंचायत को निर्माण एजेंसी बनाया गया।

उन्नत नस्लों से बढ़ेगी आय
स्थानीय नस्लों के साथ-साथ उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए सिरोही और जमनापारी जैसी उन्नत नस्लों के बकरे उपलब्ध कराने की पहल की गई। बिहान से जुड़ी महिलाओं को आर्थिक सहायता प्रदान कर उन्नत नस्ल के बकरे खरीदने के लिए प्रोत्साहित किया गया। प्रथम चरण में 10 परिवारों को उन्नत नस्ल के बकरे उपलब्ध कराए गए हैं।

योजनाओं का अभिसरण बना सफलता की कुंजी
कलेक्टर श्रीमती रोक्तिमा यादव ने कहा कि आदिवासी परिवारों की रुचि एवं स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग तथा मनरेगा टीम द्वारा किया गया यह प्रयास सराहनीय है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि सरकार की मंशानुरूप महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने की परिकल्पना को यह पहल निश्चित रूप से सफल बनाएगी और ग्रामीण विकास का एक अनुकरणीय मॉडल स्थापित करेगी।

चरणबद्ध विकास की कार्ययोजना
जिला पंचायत कोरिया के मुख्य कार्यपालन अधिकारी डॉ. आशुतोष चतुर्वेदी ने बताया कि कलेक्टर श्रीमती रोक्तिमा यादव के मार्गदर्शन में महिलाओं के स्वावलंबन के लिए चरणबद्ध कार्ययोजना तैयार की गई है। प्रथम चरण में मई माह के अंतिम सप्ताह में 10 परिवारों को उन्नत नस्ल के बकरे उपलब्ध कराए गए हैं। आगामी दो माह तक इनकी निगरानी की जाएगी ताकि स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप इनके अनुकूलन का आकलन किया जा सके। इसके बाद शेष परिवारों को भी उन्नत नस्ल के बकरे उपलब्ध कराए जाएंगे। डॉ. आशुतोष चतुर्वेदी ने बताया कि प्रथम चरण में शामिल परिवारों के पास पहले से ही पर्याप्त संख्या में बकरियां हैं। उन्नत नस्ल के बकरों के सफल पालन से अगले एक वर्ष में प्रत्येक परिवार की वार्षिक आय एक से डेढ़ लाख रुपये तक पहुंचने की संभावना है।

प्रथम चरण के लाभार्थी
प्रथम चरण में जिन महिलाओं ने अपने संसाधनों से उन्नत नस्ल के बकरे खरीदे हैं उनमें श्रीमती कौशिल्या, श्रीमती सहोदरी, श्रीमती धनपतिया, श्रीमती सोनमती, श्रीमती सुमित्रा, श्रीमती सोनकुंवर, श्रीमती इंद्रकुंवर, श्रीमती निराशो, श्रीमती सोनमत एवं श्रीमती लीलावती शामिल हैं। इससे सभी महिलाएं 'लखपति दीदी' की श्रेणी में शामिल हो सकेंगी। भविष्य में गांव की सभी 50 महिलाएं इस श्रेणी में शामिल होकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई आकार व मजबूती देंगी।







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