विशेष पिछड़ी जनजाति का दर्जा, लेकिन शिक्षा अब भी दूर: गरियाबंद के भुंजिया समाज ने उठाई छात्रावास और हाई स्कूल की मांग

विशेष पिछड़ी जनजाति का दर्जा, लेकिन शिक्षा अब भी दूर: गरियाबंद के भुंजिया समाज ने उठाई छात्रावास और हाई स्कूल की मांग

केंद्र कमेटी भुंजिया समाज ने शासन से की 100 सीटर कन्या छात्रावास, तेंदुबाय में हाई स्कूल, छात्रवृत्ति और सुरक्षित परिवहन की मांग; कहा— शिक्षा ही समाज के विकास का सबसे बड़ा आधार।

परमेश्वर राजपूत, गरियाबंद :छत्तीसगढ़ अपनी समृद्ध जनजातीय संस्कृति और आदिवासी विरासत के लिए पूरे देश में जाना जाता है। राज्य सरकार ने सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े समुदायों के उत्थान के उद्देश्य से कई जनजातियों को विशेष पिछड़ी जनजाति (PVTG) का दर्जा प्रदान किया है। इनमें भुंजिया समाज भी शामिल है। हालांकि, सरकारी योजनाओं और घोषणाओं के बावजूद गरियाबंद जिले के भुंजिया बाहुल्य क्षेत्रों में शिक्षा की स्थिति आज भी चिंता का विषय बनी हुई है।केंद्र कमेटी भुंजिया समाज के अनुसार, समाज के अधिकांश बच्चे शिक्षा प्राप्त करना चाहते हैं और आगे बढ़ने का सपना देखते हैं, लेकिन आर्थिक तंगी, दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियां और शैक्षणिक सुविधाओं की कमी उनके भविष्य के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा बन गई है। प्राथमिक स्तर तक किसी तरह पढ़ाई पूरी करने वाले अधिकांश बच्चों की शिक्षा इसके बाद रुक जाती है।

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समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि भुंजिया समाज के अधिकांश गांव घने जंगलों और दूरस्थ क्षेत्रों में बसे हुए हैं। प्राथमिक विद्यालय तो किसी तरह उपलब्ध हैं, लेकिन माध्यमिक, हाई स्कूल और हायर सेकेंडरी विद्यालय कई किलोमीटर दूर स्थित हैं। बच्चों को प्रतिदिन लंबी दूरी पैदल तय करनी पड़ती है। बरसात और वन क्षेत्रों के रास्तों के कारण यह सफर और भी कठिन हो जाता है। विशेष रूप से बालिकाओं की शिक्षा सबसे अधिक प्रभावित होती है, जिसके चलते बड़ी संख्या में छात्राएं प्राथमिक शिक्षा के बाद ही पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हो जाती है।समाज का दावा है कि वर्तमान में भुंजिया समाज के लगभग 90 प्रतिशत बच्चे उच्च शिक्षा से वंचित रह जाते हैं। आर्थिक कमजोरी के कारण परिवार बच्चों को बाहर पढ़ाने या किराए पर कमरा लेकर रखने में सक्षम नहीं हैं। परिणामस्वरूप अनेक बच्चे कम उम्र में ही मजदूरी अथवा अन्य कार्यों में लग जाते हैं।

केंद्र कमेटी भुंजिया समाज ने बताया कि समाज की ओर से कई बार शासन और प्रशासन को छात्रावास निर्माण एवं अन्य शैक्षणिक सुविधाओं की मांग को लेकर आवेदन प्रस्तुत किए गए, लेकिन अब तक कोई ठोस पहल नहीं हो सकी। समाज का मानना है कि यदि ब्लॉक स्तर पर छात्रावास की सुविधा उपलब्ध हो जाए तो दूरस्थ गांवों के बच्चों, विशेषकर बेटियों की शिक्षा का मार्ग काफी आसान हो सकता है।
समाज ने सरकार से सवाल उठाते हुए कहा कि जब भुंजिया समाज को विशेष पिछड़ी जनजाति का दर्जा प्राप्त है, तो उनके लिए शिक्षा से जुड़ी विशेष योजनाएं जमीनी स्तर पर प्रभावी रूप से क्यों दिखाई नहीं दे रही हैं? क्या सरकार के पास ऐसे बच्चों के ड्रॉपआउट की वास्तविक स्थिति का आंकलन है? और क्या विशेष पिछड़ी जनजातियों को शिक्षा से जोड़ने के बिना विकसित एवं शिक्षित छत्तीसगढ़ की कल्पना संभव है?

समाज की प्रमुख मांगें
भुंजिया बाहुल्य ग्राम पंचायत पिपरछेड़ी में 100 सीटर कन्या छात्रावास तत्काल संचालित किया जाए।
ग्राम पंचायत तेंदुबाय में हाई स्कूल की स्थापना कर विद्यार्थियों को स्थानीय स्तर पर शिक्षा उपलब्ध कराई जाए।
भुंजिया समाज के विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा हेतु विशेष छात्रवृत्ति एवं आर्थिक सहायता की व्यवस्था की जाए।
दुर्गम क्षेत्रों से स्कूलों तक विद्यार्थियों की सुरक्षित आवाजाही के लिए परिवहन सुविधा उपलब्ध कराई जाए।

केंद्र कमेटी भुंजिया समाज ने कहा कि किसी भी समाज का वास्तविक विकास शिक्षा से ही संभव है। यदि आज भुंजिया समाज के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, छात्रावास और आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए जाते हैं, तो आने वाले समय में यह समाज आत्मनिर्भर और सशक्त बन सकता है। समिति ने राज्य सरकार और जिला प्रशासन से मांग की है कि विशेष पिछड़ी जनजाति के संवैधानिक संरक्षण की भावना के अनुरूप शीघ्र ठोस कदम उठाए जाएं, ताकि भुंजिया समाज के बच्चों के हाथों में मजदूरी के औजार नहीं, बल्कि शिक्षा की कलम हो और उनका भविष्य उज्ज्वल बन सके।







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