लोकतंत्र की असली परीक्षा: जब अधिकार की आवाज़ पर लाठियां भारी पड़ जाएं

लोकतंत्र की असली परीक्षा: जब अधिकार की आवाज़ पर लाठियां भारी पड़ जाएं

शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र की आत्मा है, संवाद के बजाय बल प्रयोग लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है

 

परमेश्वर राजपूत, गरियाबंद : भारत का लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित नहीं है, बल्कि नागरिकों को अपनी बात शांतिपूर्ण ढंग से रखने, विरोध दर्ज कराने और न्याय की मांग करने का संवैधानिक अधिकार भी देता है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने सत्य, अहिंसा और संवाद को जनआंदोलनों की सबसे बड़ी शक्ति बताया था। उनका स्पष्ट मानना था कि "शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन लोकतंत्र की आत्मा है।" ऐसे में जब अपने भविष्य को लेकर चिंतित छात्र, किसान या आम नागरिक अहिंसक तरीके से अपनी मांगों को लेकर सड़क पर उतरते हैं, तो सबसे पहले संवाद और संवेदनशीलता की अपेक्षा की जाती है, न कि बल प्रयोग की।हाल के वर्षों में प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाओं ने देश के लाखों युवाओं के भविष्य को अनिश्चितता के दौर में ला खड़ा किया है। विशेष रूप से मेडिकल प्रवेश परीक्षा (NEET) सहित कई प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर छात्रों में गहरी चिंता और आक्रोश देखने को मिला। ऐसे में यदि छात्र शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करते हैं, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था का दायित्व है कि उनकी बात सुनी जाए और निष्पक्ष जांच तथा जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।

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लोकतंत्र की विडंबना यह भी रही है कि विपक्ष में रहते हुए अधिकांश राजनीतिक दल विरोध प्रदर्शनों को लोकतांत्रिक अधिकार बताते हैं, लेकिन सत्ता में आने के बाद कई बार वही दल प्रशासनिक सख्ती का समर्थन करते दिखाई देते हैं। यह प्रवृत्ति किसी एक दल तक सीमित नहीं रही है, बल्कि भारतीय राजनीति के लिए आत्ममंथन का विषय है। लोकतंत्र की मजबूती इस बात में है कि सत्ता आलोचना को स्वीकार करे और असहमति को राष्ट्रविरोध नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा माने।

पेपर लीक जैसी घटनाओं का सबसे अधिक असर मध्यमवर्गीय और गरीब परिवारों पर पड़ता है। किसान, मजदूर, छोटे व्यापारी और नौकरीपेशा परिवार अपने बच्चों की पढ़ाई पर वर्षों की मेहनत और लाखों रुपये खर्च करते हैं। कई परिवार शिक्षा के लिए ऋण तक लेते हैं। ऐसे में यदि परीक्षा रद्द होती है या उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, तो केवल परीक्षा ही नहीं, बल्कि पूरे परिवार के सपने और वर्षों का संघर्ष प्रभावित होता है।ऐसी परिस्थितियों में कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस और सुरक्षा बलों का कर्तव्य है, लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि बल प्रयोग अंतिम विकल्प हो। शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के साथ संयम, संवेदनशीलता और मानवीय व्यवहार लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करता है। संवाद हमेशा टकराव से बेहतर विकल्प होता है।

पेपर लीक जैसी घटनाओं पर कठोर कार्रवाई, दोषियों की जवाबदेही, पारदर्शी जांच और परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। यदि युवाओं का विश्वास व्यवस्था से उठने लगे, तो यह किसी भी लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं माना जा सकता।देश का भविष्य केवल सरकारों के हाथों में नहीं, बल्कि उन करोड़ों युवाओं के सपनों में भी बसता है जो ईमानदारी से मेहनत कर अपने जीवन को बेहतर बनाना चाहते हैं। इसलिए आवश्यक है कि उनकी आवाज़ को सुना जाए, उनकी चिंताओं का समाधान किया जाए और लोकतंत्र को उसकी मूल भावना—संवाद, न्याय और संवेदनशीलता—के साथ आगे बढ़ाया जाए।







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