बांस के बर्तन बनाकर बेचने वाले राम सिंग कमार की पीड़ा—दुकान से 40 रुपये किलो तक चावल खरीदकर गुजार रहे जिंदगी, सरपंच ने दो महीने तक अपने राशन से की मदद; सरकारी योजनाओं के लाभ पर उठे सवाल
परमेश्वर राजपूत, गरियाबंद/ छुरा : सरकार की ओर से विशेष पिछड़ी जनजातियों के परिवारों को खाद्य सुरक्षा और बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने के दावे किए जाते हैं, लेकिन गरियाबंद जिले के वनांचल क्षेत्र में रहने वाले एक कमार परिवार की स्थिति इन दावों के जमीनी क्रियान्वयन पर सवाल खड़े कर रही है। ग्राम पंचायत रुवाड़ के मलेवा पहाड़ के नीचे बसे ग्राम ढूंढूंनीपानी के निवासी राम सिंग कमार का कहना है कि उन्हें पिछले तीन महीने से शासकीय उचित मूल्य की दुकान से चावल नहीं मिल रहा है। परिवार की आजीविका का साधन बांस के बर्तन बनाकर बेचना है। ऐसे में राशनकार्ड से चावल नहीं मिलने के कारण उन्हें अपनी मेहनत की कमाई से दुकान से 40 रुपये प्रति किलो तक की दर से चावल खरीदकर जीवन गुजारना पड़ रहा है।राम सिंग कमार की आर्थिक स्थिति पहले से ही सीमित है। वे बांस से घरेलू उपयोग के बर्तन बनाते हैं और उन्हें बेचकर परिवार की जरूरतें पूरी करते हैं। इस काम से होने वाली आमदनी पर ही उनकी रोजमर्रा की जिंदगी निर्भर है। लेकिन जब सरकारी उचित मूल्य की दुकान से मिलने वाला चावल बंद हो गया, तो परिवार के सामने भोजन की व्यवस्था करना भी चुनौती बन गया। जिन योजनाओं का उद्देश्य गरीब और विशेष रूप से कमजोर जनजातीय परिवारों को खाद्य सुरक्षा प्रदान करना है, उन्हीं योजनाओं का लाभ नहीं मिलने से राम सिंग को बाजार से महंगे दाम पर चावल खरीदना पड़ रहा है।
पत्नी के निधन के बाद निरस्त हुआ राशनकार्ड
इस मामले में शासकीय उचित मूल्य की दुकान के सेल्समैन अश्विनी कुमार ने बताया कि राम सिंग कमार का राशनकार्ड उनकी पत्नी मंगली बाई कमार के नाम पर था। उनकी पत्नी का निधन हो चुका है। सेल्समैन के अनुसार, संभवतः ई-केवाईसी नहीं होने के कारण राशनकार्ड निरस्त हो गया है। उन्होंने कहा कि जब तक राशनकार्ड ऑनलाइन सक्रिय था, तब तक राम सिंग को नियमित रूप से चावल दिया जाता था।सेल्समैन के इस बयान से राशनकार्ड निरस्त होने और उसके बाद खाद्यान्न वितरण बंद होने की स्थिति सामने आती है। हालांकि, कार्ड निरस्त होने की वास्तविक वजह, संबंधित रिकॉर्ड और परिवार की वर्तमान पात्रता की आधिकारिक जांच आवश्यक है। सवाल यह भी है कि पत्नी के निधन के बाद परिवार के राशनकार्ड को अद्यतन कराने और पात्र सदस्य को खाद्यान्न उपलब्ध कराने के लिए संबंधित स्तर पर क्या प्रयास किए गए।
सरपंच ने दो महीने तक अपने राशन से की मदद
ग्राम पंचायत रुवाड़ के सरपंच विजय कृष्ण नागेश ने बताया कि राम सिंग कमार का राशनकार्ड निरस्त हो चुका है। उन्होंने नया राशनकार्ड बनवाने के लिए आवेदन का फॉर्म भरने हेतु राम सिंग को बुलाया था, लेकिन वे नहीं आ पाए। सरपंच के अनुसार, उन्होंने मानवीय सहयोग के तौर पर दो महीने तक अपने परिवार के राशनकार्ड से मिलने वाला चावल राम सिंग को दिया था।सरपंच की ओर से किए गए इस सहयोग से जरूरतमंद परिवार को कुछ राहत जरूर मिली, लेकिन यह व्यवस्था स्थायी समाधान नहीं है। किसी गरीब परिवार को नियमित खाद्यान्न उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी केवल व्यक्तिगत मदद पर निर्भर नहीं रह सकती। जरूरत इस बात की है कि संबंधित विभाग परिवार की वास्तविक स्थिति का परीक्षण कर नियमानुसार राशनकार्ड और खाद्यान्न वितरण की समस्या का समाधान करे।
आखिर किसकी जिम्मेदारी है जरूरतमंद तक राशन पहुंचाना?
राम सिंग कमार का मामला केवल एक राशनकार्ड निरस्त होने का विषय नहीं है, बल्कि यह भी सवाल उठाता है कि विशेष पिछड़ी जनजाति के जरूरतमंद परिवारों तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने की व्यवस्था कितनी प्रभावी है। यदि किसी परिवार के मुखिया या राशनकार्डधारी सदस्य की मृत्यु हो जाती है, तो उसके बाद परिवार को खाद्यान्न की सुविधा से वंचित रहने से बचाने के लिए आवश्यक मार्गदर्शन और नियमानुसार प्रक्रिया पूरी कराने की पहल कौन करेगा?विशेष पिछड़ी जनजातियों के सामाजिक और आर्थिक उत्थान के लिए योजनाएं संचालित की जाती हैं। ऐसे में यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि दस्तावेजी प्रक्रिया, ई-केवाईसी या राशनकार्ड में नाम संबंधी समस्या के कारण कोई पात्र परिवार लंबे समय तक खाद्यान्न से वंचित न रहे। राम सिंग के मामले में चार महीने से चावल नहीं मिलने की बात सामने आने के बाद खाद्य विभाग, संबंधित पंचायत और प्रशासन की भूमिका पर ध्यान जाना स्वाभाविक है।
जांच कर तत्काल समाधान की जरूरत
अब जरूरत है कि खाद्य विभाग और जिला प्रशासन मामले की जांच करें। राम सिंग कमार की पात्रता, पुराने राशनकार्ड की स्थिति और निरस्तीकरण के कारणों का परीक्षण कर नए राशनकार्ड अथवा नियमानुसार वैकल्पिक व्यवस्था के माध्यम से उन्हें खाद्यान्न उपलब्ध कराने की दिशा में पहल की जाए। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि पत्नी के निधन के बाद राशनकार्ड में आवश्यक संशोधन कराने की प्रक्रिया परिवार तक क्यों नहीं पहुंच पाई और समस्या के समाधान में अब तक कितना प्रयास हुआ है।सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब एक विशेष पिछड़ी जनजाति का व्यक्ति बांस के बर्तन बनाकर जीवन चलाने के बावजूद सरकारी राशन से वंचित होने की बात कह रहा है, तो उसकी समस्या का समाधान कब होगा? सरकारी योजनाओं की सफलता केवल घोषणाओं और आंकड़ों से नहीं, बल्कि इस बात से तय होती है कि उनका लाभ अंतिम पंक्ति में खड़े जरूरतमंद व्यक्ति तक पहुंच रहा है या नहीं। राम सिंग कमार को तीन महीने से चावल नहीं मिलने का मामला प्रशासन के लिए एक ऐसी चुनौती है, जिस पर संवेदनशीलता के साथ तत्काल ध्यान देने की जरूरत है।




