15 साल बाद भी अनसुलझे सवाल बरकरार, घर में पांच लोगों की मौजूदगी में गोली मारकर हत्या ने खड़े किए कई सवाल
परमेश्वर राजपूत,गरियाबंद/छुरा :छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के छुरा नगर में 23 जनवरी 2011 को पत्रकार उमेश राजपूत की गोली मारकर की गई हत्या को 15 वर्ष से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन इस सनसनीखेज हत्याकांड से जुड़े कई सवाल आज भी अनुत्तरित हैं। घटना की जांच देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) तक पहुंचने के बावजूद अब तक हत्याकांड की पूरी सच्चाई सामने नहीं आ सकी है। ऐसे में यह सवाल लगातार उठ रहा है कि क्या उमेश राजपूत की हत्या महज एक आपराधिक घटना थी या इसके पीछे कोई सुनियोजित साजिश थी?
गृहग्राम से लौटने के बाद घर में हुई हत्या
बताया जाता है कि 23 जनवरी 2011 को उमेश राजपूत अपने गृह ग्राम हीराबतर गए थे। हीराबतर से लौटने के बाद वे छुरा स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र भी गए और इसके बाद नगर में विभिन्न लोगों से मुलाकात की। दिनभर सामान्य गतिविधियों के बाद वे छुरा नगर स्थित अपने घर पहुंचे।
परिजनों के अनुसार, घर से फोन आने के बाद उमेश राजपूत घर गए थे। उस समय घर में उनके दो परिजन और तीन अन्य लोग मौजूद थे। इसी दौरान गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई।
घटना के बाद मौके पर ऐसी पर्ची मिलने की बात सामने आई थी, जिसमें उन्हें समाचार लिखना बंद करने तथा छुरा छोड़कर चले जाने की धमकी दी गई थी। इस कथित धमकी ने शुरू से ही इस हत्याकांड को सामान्य आपराधिक घटना से अलग नजरिए से देखने के सवाल खड़े किए।
जंगल रास्ते के बजाय घर को ही क्यों चुना गया?
हत्याकांड को लेकर सबसे बड़ा सवाल घटना के स्थान को लेकर उठता है। उमेश राजपूत घटना के दिन अपने गृह ग्राम हीराबतर गए थे। ग्रामीण एवं जंगल क्षेत्र होने के कारण यदि किसी व्यक्ति या समूह का उद्देश्य उनकी हत्या करना ही होता, तो उनके गांव आने-जाने के दौरान भी उन्हें निशाना बनाया जा सकता था।
लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
वे सुरक्षित रूप से छुरा लौटे, नगर में लोगों से मिले और बाद में अपने घर पहुंचे। इसके बाद घर में मौजूद लोगों के बीच उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई।
ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि यदि हत्या पहले से तय थी, तो हत्यारों ने ऐसा स्थान और समय क्यों चुना, जहां घर के भीतर कई लोगों की मौजूदगी थी? क्या हत्यारे उमेश राजपूत की गतिविधियों और उनके घर पहुंचने के समय से पूरी तरह वाकिफ थे?
इन सवालों का स्पष्ट जवाब आज भी जांच के निष्कर्षों से सामने नहीं आया है।
धमकी भरी पर्ची ने बढ़ाया संदेह
घटना स्थल से कथित तौर पर मिली धमकी भरी पर्ची भी इस मामले का महत्वपूर्ण पहलू रही है। पर्ची में समाचार लिखना बंद करने और छुरा छोड़कर चले जाने की चेतावनी दिए जाने की बात कही गई थी।
यदि यह पर्ची वास्तव में हत्यारों द्वारा छोड़ी गई थी, तो यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि उमेश राजपूत द्वारा लिखी जा रही किन खबरों या किन मुद्दों से किसी व्यक्ति अथवा समूह को आपत्ति थी? क्या उनकी पत्रकारिता ही हत्या का कारण बनी? क्या उन्हें पहले से धमकियां मिल रही थीं? और यदि धमकी दी गई थी तो उसके पीछे कौन लोग थे?
इन सवालों का जवाब सामने आना आज भी बाकी है।
थाने से साक्ष्य गायब होने का आरोप, जिम्मेदारी तय क्यों नहीं?
इस हत्याकांड की जांच प्रक्रिया पर भी समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। परिजनों की ओर से स्थानीय पुलिस थाने से महत्वपूर्ण साक्ष्य गायब होने के आरोप लगाए जाते रहे हैं।
यदि जांच के दौरान वास्तव में कोई महत्वपूर्ण साक्ष्य पुलिस अभिरक्षा से गायब हुआ था, तो यह अपने आप में बेहद गंभीर विषय है। ऐसे में सवाल उठता है कि साक्ष्य गायब होने के लिए जिम्मेदार कौन था और उसके खिलाफ क्या कार्रवाई की गई?
परिजनों और मामले से जुड़े लोगों की मांग रही है कि यदि साक्ष्यों के संरक्षण में लापरवाही या जानबूझकर छेड़छाड़ हुई थी तो इसकी स्वतंत्र जांच कर जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।
ब्रेन मैपिंग रिपोर्ट को लेकर भी उठे सवाल
परिजनों का दावा है कि जांच के दौरान हुई ब्रेन मैपिंग से भी प्रभावशाली लोगों द्वारा कथित रूप से सुपारी देकर हत्या कराए जाने की दिशा में संकेत मिले थे। हालांकि ऐसे दावों और रिपोर्ट की प्रमाणिकता तथा उसका न्यायिक महत्व जांच एजेंसियों और न्यायालय के स्तर पर ही निर्धारित किया जा सकता है।
परिजनों का कहना है कि उन्हें शुरू से ही आशंका रही है कि उमेश राजपूत की हत्या के पीछे प्रभावशाली लोगों का हाथ हो सकता है और इसी वजह से वास्तविक षड्यंत्रकारियों तक जांच नहीं पहुंच पाई।
15 साल बाद भी सवाल वही—कौन था असली हत्यारा?
उमेश राजपूत हत्याकांड को डेढ़ दशक से अधिक समय बीत चुका है। इस दौरान जांच स्थानीय पुलिस से आगे बढ़कर सीबीआई तक पहुंची, लेकिन परिजनों के मन में आज भी कई सवाल हैं।
उनका कहना है कि यदि हत्या के पीछे कोई बड़ी साजिश नहीं थी तो घटना स्थल पर धमकी भरी पर्ची क्यों छोड़ी गई? यदि हत्या पत्रकारिता से जुड़ी किसी खबर या विवाद का परिणाम थी तो उस दिशा में अंतिम निष्कर्ष क्यों सामने नहीं आया? यदि प्रभावशाली लोगों की संलिप्तता की आशंका थी तो उनकी भूमिका की निर्णायक जांच क्यों नहीं हुई? और यदि पुलिस रिकॉर्ड या साक्ष्य में कोई कमी अथवा गायब होने की बात सामने आई थी, तो जिम्मेदारी तय क्यों नहीं हुई?
न्याय के इंतजार में परिवार
23 जनवरी 2011 की वह घटना आज भी उमेश राजपूत के परिवार के लिए एक ऐसा जख्म है, जो 15 वर्ष बाद भी नहीं भर पाया है। परिवार चाहता है कि हत्याकांड की पूरी सच्चाई सामने आए और हत्या के पीछे वास्तविक कारण तथा इसमें शामिल प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका स्पष्ट हो।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या उमेश राजपूत की हत्या एक सुनियोजित हत्या थी? क्या इसके पीछे कोई बड़ा षड्यंत्र था? क्या धमकी भरी पर्ची हत्या के उद्देश्य की ओर इशारा करती है? और यदि ऐसा था तो इतने वर्षों बाद भी उस साजिश का पर्दाफाश क्यों नहीं हो सका?
इन सवालों के जवाब केवल उमेश राजपूत के परिवार को ही नहीं, बल्कि पत्रकारिता जगत और समाज को भी इंतजार है।
हालांकि, हत्याकांड से जुड़े आरोपों और आशंकाओं की अंतिम पुष्टि जांच एजेंसी तथा न्यायालय के निष्कर्षों से ही होगी।




