‘17 साल की उम्र में सहमति का कानूनी महत्व नहीं’… नाबालिग से दुष्कर्म मामले में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

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बिलासपुर : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने नाबालिग को बहला-फुसलाकर ले जाने और उसके साथ बार-बार दुष्कर्म करने के मामले में दोषी की अपील खारिज कर दी है। अदालत ने अंबिकापुर की विशेष पॉक्सो अदालत द्वारा सुनाई गई सजा को बरकरार रखा। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि घटना के समय पीड़िता की उम्र 17 साल 6 महीने थी। ऐसे में उसकी कथित सहमति को कानूनन मान्यता नहीं दी जा सकती।

जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकल पीठ ने आरोपी की ओर से पेश दलीलों पर विचार करने के बाद निचली अदालत के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

शादी का झांसा देकर ले जाने का आरोप

मामले के अनुसार, आरोपी पीड़िता का दूर का रिश्तेदार था और कुछ समय तक उसके परिवार के घर में रहा था। आरोप है कि इसी दौरान उसने पीड़िता को बहलाकर उसके साथ कई बार शारीरिक संबंध बनाए। परिवार को इसकी जानकारी मिलने पर आरोपी को घर से निकाल दिया गया। इसके बावजूद वह मोबाइल फोन के जरिए पीड़िता के संपर्क में बना रहा।

आरोप के मुताबिक, 17 जनवरी 2017 को आरोपी शादी का झांसा देकर पीड़िता को अपने साथ ले गया। परिजनों की शिकायत पर पुलिस ने अपहरण का मामला दर्ज किया। बाद में 29 जनवरी 2017 को पुलिस ने पीड़िता को आरोपी के कब्जे से बरामद किया।

पीड़िता ने अपने बयान में आरोप लगाया कि आरोपी उसे अलग-अलग स्थानों पर ले गया और इस दौरान उसके साथ बार-बार दुष्कर्म किया। उसने विरोध करने पर मारपीट करने और जान से मारने की धमकी देने की बात भी कही।

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उम्र को लेकर आरोपी ने दी थी चुनौती

हाईकोर्ट में अपील के दौरान आरोपी की ओर से दलील दी गई कि पीड़िता के पहले स्कूल का मूल रिकॉर्ड पेश नहीं किया गया। बचाव पक्ष ने दोनों के बीच संबंधों को सहमति से बना बताया और गवाहों के बयानों में विरोधाभास होने का तर्क भी रखा।

हालांकि, हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत के सामने पेश दस्तावेजों के अनुसार, पीड़िता के पिता ने स्कूल में दाखिला कराते समय उसकी जन्मतिथि 1 जुलाई 1999 दर्ज कराई थी। पांचवीं कक्षा के स्कूल रिकॉर्ड के साथ दसवीं की अंकसूची में भी यही जन्मतिथि दर्ज थी। दसवीं की अंकसूची छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, रायपुर की ओर से जारी की गई थी।

अदालत ने इन दस्तावेजों को पीड़िता की उम्र निर्धारित करने के लिए विश्वसनीय माना। इसी आधार पर घटना के समय उसकी उम्र 18 वर्ष से कम पाई गई।

पीड़िता की गवाही को माना विश्वसनीय

हाईकोर्ट ने पाया कि पीड़िता के बयान की उसके माता-पिता, चाचा और जांच अधिकारी की गवाही से पुष्टि होती है। अदालत के अनुसार, बचाव पक्ष की जिरह के दौरान ऐसा कोई महत्वपूर्ण विरोधाभास सामने नहीं आया, जिससे पीड़िता की गवाही पर संदेह किया जा सके।

अदालत ने यह भी माना कि आरोपी को पीड़िता की उम्र की जानकारी थी। नाबालिग होने के कारण उसकी कथित सहमति को दुष्कर्म के आरोप से बचाव का आधार नहीं माना जा सकता।

विशेष पॉक्सो अदालत ने सुनाई थी 10 साल की सजा

अंबिकापुर की विशेष पॉक्सो अदालत ने 3 अगस्त 2022 को आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 363 के तहत तीन साल, धारा 366 के तहत पांच साल और धारा 376(2)(n) के तहत 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। अदालत ने जुर्माना भी लगाया था और सभी सजाओं को एक साथ चलाने का आदेश दिया था।

अब हाईकोर्ट ने आरोपी की अपील खारिज करते हुए दोषसिद्धि और सजा बरकरार रखी है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, आरोपी पहले से जेल में है।

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