हिंदू प्राचीन ग्रंथों में सप्त ऋषियों का जिक्र किया जाता है। हिंदू भगवत पुराण और पौराणिक कथाओं में सप्त ऋषियों को ब्रह्मा जी का मानस पुत्र बताया जाता है। इन सप्त ऋषियों जिक्र तारामंडल आकाश में 7 तारों के समूह के तौर पर भी किया जाता है।
इन सात तारों के नाम प्राचीन काल के इन सप्त ऋषियों पर ही रखे गए हैं। जो क्रतु, पुलह, पुलस्त्य, अत्रि, अंगिरस, वशिष्ठ और मारीचि हैं। लेकिन इन सात तारों में से वशिष्ठ नाम का तारा असल में दो तारे हैं।
अरुंधति कौन थीं?प्राचीन धर्म ग्रंथों और पौराणिक कथाओं में इन्हें वशिष्ठ और अरुंधती तारा के नाम से जाना जाता है। इनमें से वशिष्ठ नाम का तारा आकाश मंडल में स्थिर रहता है, जबकि दूसरा तारा अरुंधती उसके चारों और परिक्रमा यानी घूमता रहता है। सप्तर्षि तारामंडल में सभी ऋषियों के साथ अरुंधती एकमात्र स्त्री और पत्नी हैं, जो अपने पति ऋषि वशिष्ठ के साथ हमेशा रहती है।
हिंदू विवाह अनुष्ठानों के दौरान पंडित नवविवाहित जोड़े को आसमान में अरुंधती नक्षत्र दिखाते हैं, जो वैवाहिक जोड़े की निकटता और आपसी निर्भरता को दर्शाता है। संस्कृति में इस रिवाज को ‘अरुन्धतीदर्शनन्याय:’ कहा जाता है। महाभारत में अरुंधती को एक पवित्र और आदर्श पत्नी के रूप में परिभाषित किया गया है। आइए जानते हैं इससे जुड़ी पौराणिक कथा के बारे में।
तब अरुंधती ने कठिन तपस्या की और भगवान शिव ब्राह्मण के रूप में उनके सामने प्रकट हुए। चूंकि बारिश न होने के कारण अरुंधती के पास खाना नहीं था, इसलिए उन्होंने कुछ सस्ती जड़ों से खाना बनाया और ब्राह्मण के रूप में भगवान शिव को परोसा, जिसके बाद पूरे देश भर में भरपूर बर्ष हुई। तब भगवान शिव ने अपना असल रूप धारण करते हुए अरुंधती को आशीर्वाद प्रदान किया। जिसके बाद भगवान शिव ने अरुंधती के रहने को पवित्र और सर्वोत्तम बताकर अंतर्धान हो गए।

