परमेश्वर राजपूत, गरियाबंद/छुरा: किसानों और आम नागरिकों के राजस्व संबंधी मामलों के त्वरित निराकरण को लेकर जिला प्रशासन द्वारा लगातार निर्देश दिए जाने के बावजूद राजस्व विभाग के मैदानी कार्यालयों में वर्षों पुराने प्रकरण लंबित होने का मामला सामने आया है। जिला मुख्यालय में आयोजित नियमित बैठकों में कलेक्टर द्वारा फौती, बंटवारा, नामांतरण, त्रुटि सुधार सहित अन्य राजस्व मामलों का प्राथमिकता के साथ निराकरण करने के निर्देश दिए जाने की बात कही जाती है, लेकिन छुरा तहसील कार्यालय और अनुविभागीय अधिकारी राजस्व कार्यालय में कई प्रकरण दो से तीन वर्ष या उससे अधिक समय से लंबित बताए जा रहे हैं।
आरोप है कि किसान और ग्रामीण अपने छोटे-छोटे राजस्व कार्यों के लिए लगातार तहसील और एसडीएम कार्यालय के चक्कर लगाने को मजबूर हैं। कई मामलों में आवेदकों को सुनवाई और पेशी के लिए बार-बार तारीख दी जाती है, लेकिन अंतिम निराकरण में लंबा समय लग रहा है। इससे ग्रामीणों में राजस्व व्यवस्था की कार्यप्रणाली को लेकर नाराजगी बढ़ती जा रही है।
दो साल तहसील में सुनवाई, फिर एसडीएम कार्यालय में भी वर्षों से मामला विचाराधीन
ग्राम हीराबतर के कृषक परमेश्वर राजपूत ने भूमि रिकॉर्ड में सामान्य त्रुटि सुधार के लिए आवश्यक दस्तावेजों और रिकॉर्ड के साथ तहसील कार्यालय में आवेदन प्रस्तुत किया था। उनका कहना है कि प्रकरण में लगभग दो वर्षों तक पेशी और सुनवाई चलती रही, जिसके बाद आवेदन निरस्त कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने नियमानुसार अनुविभागीय अधिकारी राजस्व कार्यालय में आवेदन प्रस्तुत किया। यहां भी लगभग दो वर्षों से सुनवाई और पेशी की प्रक्रिया चल रही है तथा मामला अभी तक विचाराधीन बताया जा रहा है।
कृषक का सवाल है कि यदि रिकॉर्ड और दस्तावेज उपलब्ध होने के बावजूद एक सामान्य त्रुटि सुधार के मामले में ही वर्षों लग जाएं तो आम किसान आखिर न्याय और प्रशासनिक राहत के लिए कहां जाए?
पटवारी हल्का नंबर 31 का पुराना रिकॉर्ड कहां गया?
ग्राम हीराबतर के कृषक परमेश्वर राजपूत द्वारा पुराने राजस्व रिकॉर्ड से संबंधित जानकारी और दस्तावेजों के लिए तहसील कार्यालय में आवेदन भी प्रस्तुत किया गया। बताया जा रहा है कि पटवारी हल्का नंबर 31 से संबंधित पुराने रिकॉर्ड का बंडल अब तक उपलब्ध नहीं हो पाया है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि राजस्व विभाग के रिकॉर्ड रूम में संरक्षित रहने वाला किसी पूरे पटवारी हल्के का पुराना रिकॉर्ड आखिर कहां गया? क्या रिकॉर्ड वास्तव में उपलब्ध नहीं है, रिकॉर्ड के रखरखाव में गंभीर लापरवाही हुई है या फिर किसी अन्य कारण से रिकॉर्ड गायब है? इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट किए जाने की जरूरत है। यदि रिकॉर्ड गायब हुआ है तो उसकी जिम्मेदारी भी तय की जानी चाहिए।
आदिवासी किसान भी वर्षों से लगा रहा कार्यालय के चक्कर
इसी तरह ग्राम पथर्री के आदिवासी कृषक कलिंग साय का डायवर्सन से संबंधित प्रकरण भी लंबे समय से लंबित होने की बात सामने आई है। कृषक द्वारा डायवर्सन के लिए अनुविभागीय कार्यालय में आवेदन प्रस्तुत किया गया था। इसके बाद लगभग दो वर्षों तक तहसील कार्यालय में पेशी और सुनवाई चलती रही। इसके बाद मामला अनुविभागीय कार्यालय पहुंचा, जहां भी करीब दो वर्षों से पेशी और सुनवाई का सिलसिला जारी बताया जा रहा है।
कृषक अब तक डायवर्सन के निराकरण के लिए अनुविभागीय अधिकारी राजस्व कार्यालय के चक्कर लगाने को मजबूर है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि एक किसान को अपने वैधानिक राजस्व कार्य के लिए आखिर कितने वर्षों तक कार्यालयों की दौड़ लगानी पड़ेगी?
कलेक्टर के निर्देशों की हो निगरानी, जिम्मेदारी भी तय हो
राजस्व मामलों के त्वरित निराकरण के लिए यदि जिला प्रशासन स्तर पर लगातार निर्देश जारी किए जा रहे हैं तो उनके पालन की वास्तविक स्थिति की भी नियमित समीक्षा जरूरी है। केवल बैठकों में निर्देश जारी कर देना पर्याप्त नहीं, बल्कि तहसील और एसडीएम कार्यालय स्तर पर लंबित प्रकरणों की सूची बनाकर उनकी समय-सीमा तय करना और अनावश्यक देरी के लिए जिम्मेदारी निर्धारित करना भी आवश्यक है।
जिला गरियाबंद में ऐसे कितने राजस्व प्रकरण हैं जो एक, दो या तीन वर्षों से लंबित हैं, कितने मामलों में बार-बार पेशी दी जा रही है और कितने मामलों में रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने की वजह से कार्रवाई रुकी हुई है—इसकी भी उच्चस्तरीय समीक्षा की आवश्यकता है।
किसानों का सवाल—‘तारीख पर तारीख’ कब तक?
राजस्व विभाग आम नागरिक और किसान के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक व्यवस्था में से एक है। भूमि संबंधी रिकॉर्ड, फौती, बंटवारा, नामांतरण, त्रुटि सुधार और डायवर्सन जैसे मामलों का सीधा संबंध किसानों की जमीन, उनके अधिकार और आर्थिक हितों से होता है। ऐसे मामलों में वर्षों तक सुनवाई लंबित रहना केवल प्रशासनिक देरी नहीं, बल्कि संबंधित परिवारों के लिए गंभीर परेशानी का कारण बन सकता है।
अब जरूरत इस बात की है कि जिला प्रशासन लंबित राजस्व प्रकरणों की वास्तविक स्थिति सार्वजनिक रूप से सामने लाए, वर्षों से लंबित मामलों की समीक्षा करे और जहां अनावश्यक देरी हुई है वहां जिम्मेदारी तय करे। साथ ही हीराबतर के पटवारी हल्का नंबर 31 के पुराने रिकॉर्ड के संबंध में भी जांच कर यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि रिकॉर्ड कहां है और यदि वह गायब है तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है?
सवाल अब यही है—जब कलेक्टर लगातार त्वरित निराकरण के निर्देश दे रहे हैं, तो क्या उन निर्देशों का पालन तहसील और अनुविभागीय स्तर पर हो रहा है? यदि हो रहा है तो वर्षों से लंबित मामलों का निराकरण क्यों नहीं हो पा रहा है?




