रायपुर: छत्तीसगढ़ में बाट-माप से जुड़े कारोबारियों और उद्योगों के लिए बड़ी खबर है। राज्य शासन के खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग ने विधिक माप विज्ञान व्यवस्था को सरल, पारदर्शी, डिजिटल और व्यवसाय-अनुकूल बनाने के लिए नियमों में बड़ा बदलाव किया है।
शासन ने छत्तीसगढ़ विधिक माप विज्ञान (प्रवर्तन) नियम, 2011 में संशोधन किया है। यह संशोधन विधिक माप विज्ञान अधिनियम, 2009 की धारा 53 के तहत भारत सरकार से परामर्श के बाद किया गया है।
लाइसेंस व्यवस्था खत्म, अब Registration से होगा काम
संशोधन के बाद निर्माता, सुधारक और विक्रेताओं के लिए लागू मौजूदा लाइसेंस आधारित व्यवस्था समाप्त कर दी गई है। इसके स्थान पर अब पंजीयन प्रमाण-पत्र (Certificate of Registration) की नई व्यवस्था लागू की गई है।
इसके लिए नियम 11 को पूरी तरह प्रतिस्थापित किया गया है। अब संबंधित निर्माता, सुधारक और विक्रेता विभागीय पोर्टल के माध्यम से ऑनलाइन स्व-घोषणा के आधार पर पंजीयन के लिए आवेदन कर सकेंगे।
खास बात यह है कि पंजीयन प्रमाण-पत्र जारी करने से पहले होने वाले भौतिक निरीक्षण की अनिवार्यता भी खत्म कर दी गई है।
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ऑनलाइन आवेदन और स्थायी Registration
नई व्यवस्था के तहत पंजीयन से जुड़ी ज्यादातर प्रक्रिया ऑनलाइन होगी। इसकी प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं—
पंजीयन के लिए ऑनलाइन आवेदन किया जा सकेगा।
पंजीयन स्व-घोषणा के आधार पर होगा।
पंजीयन से पहले प्रारंभिक भौतिक निरीक्षण जरूरी नहीं होगा।
प्रमाण-पत्र में संशोधन या अतिरिक्त प्रविष्टि के लिए ऑनलाइन आवेदन किया जा सकेगा।
पंजीकृत निर्माता, सुधारक और विक्रेताओं का ऑनलाइन डेटाबेस तैयार किया जाएगा।
पंजीयन प्रमाण-पत्र स्थायी रूप से वैध रहेगा।
सामान्य परिस्थितियों में पंजीयन के नवीनीकरण की आवश्यकता नहीं होगी।
दूसरे राज्य में इस्तेमाल होने वाले बाट-माप की मरम्मत भी आसान
नई व्यवस्था में व्यवसायों के लिए एक और महत्वपूर्ण राहत दी गई है।
यदि किसी निर्माता द्वारा निर्मित बाट या माप का इस्तेमाल किसी दूसरे राज्य में हो रहा है, तो उसकी मरम्मत के लिए अलग से सुधारक पंजीयन प्रमाण-पत्र लेने की आवश्यकता नहीं होगी।
ऐसी स्थिति में निर्माता द्वारा संबंधित विधिक माप विज्ञान अधिकारी को मरम्मत की पूर्व सूचना देना पर्याप्त होगा।
गलत जानकारी देने पर Registration हो सकता है रद्द
हालांकि नई व्यवस्था में प्रक्रिया आसान की गई है, लेकिन नियमों के पालन को लेकर सख्ती बरकरार रहेगी।
यदि पंजीयन के दौरान दी गई जानकारी असत्य या भ्रामक पाई जाती है अथवा विधिक माप विज्ञान अधिनियम और नियमों का उल्लंघन सामने आता है, तो जांच के बाद पंजीयन प्रमाण-पत्र निरस्त किया जा सकता है।
हालांकि, पंजीयन रद्द करने से पहले संबंधित पंजीयनधारी को अपना पक्ष रखने और उचित सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य होगा।
सुधार सूचना भी अब इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से
नियमों में उल्लंघन की स्थिति में जारी होने वाली सुधार सूचना और शमन सूचना की प्रक्रिया को भी डिजिटल कर दिया गया है।
उल्लंघन मिलने पर निर्धारित प्रारूप में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से सुधार सूचना जारी की जाएगी। यदि तय अवधि में कमियों को दूर नहीं किया जाता है, तो नियमानुसार शमन सूचना भी इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से जारी की जा सकेगी।
सुधारात्मक कार्रवाई नहीं होने की स्थिति में अधिनियम के तहत अभियोजन, अपराध का शमन, पंजीयन का निलंबन या निरस्तीकरण जैसी कार्रवाई की जा सकती है।
Registration के लिए कितनी फीस देनी होगी?
संशोधित अनुसूची में निर्माता, सुधारक और विक्रेता के लिए पंजीयन शुल्क के साथ-साथ प्रमाण-पत्र में संशोधन या अतिरिक्त प्रविष्टि के लिए भी शुल्क निर्धारित किया गया है।
प्रमुख शुल्क इस प्रकार हैं—
श्रेणी निर्धारित शुल्क
निर्माता ₹50,000
सुधारक ₹20,000
प्रमाण-पत्र में संशोधन/अतिरिक्त प्रविष्टि ₹1,000
सुधारक के लिए शुल्क राज्य/संभाग/जिला स्तर के अनुसार निर्धारित किया गया है।
उपभोक्ताओं के हितों से समझौता नहीं
सरकार ने लाइसेंस से Registration की व्यवस्था में बदलाव करते हुए कारोबारियों के लिए प्रक्रिया को आसान किया है, लेकिन उपभोक्ताओं के हितों की सुरक्षा से जुड़े प्रावधानों को बरकरार रखा गया है।
पंजीयनधारी के लिए सत्यापित और मुद्रांकित बाट-माप का उपयोग करना जरूरी होगा। साथ ही अभिलेख संधारण और नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई के प्रावधान भी लागू रहेंगे।
असत्यापित, अमुद्रांकित या अमानक बाट-माप को बिक्री के लिए रखना प्रतिबंधित रहेगा।
व्यापारियों को राहत, विभागीय व्यवस्था होगी और पारदर्शी
राज्य शासन का यह संशोधन पारंपरिक लाइसेंस आधारित प्रक्रिया की जगह सरल और डिजिटल Registration व्यवस्था स्थापित करता है।
इससे कारोबारियों के लिए अनुपालन प्रक्रिया आसान होने, विभागीय कार्यवाही में पारदर्शिता बढ़ने और ऑनलाइन सेवाओं को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। वहीं, बाट-माप की गुणवत्ता और उपभोक्ताओं के हितों की सुरक्षा से जुड़े प्रावधानों को बनाए रखते हुए सरकार ने व्यापार सुगमता और उपभोक्ता संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है।




