ओडिशा के पुरी में स्थित भगवान जगन्नाथ का मंदिर देश के सबसे प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में से एक है। यहां हर दिन हजारों श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा के दर्शन करने पहुंचते हैं। मंदिर की कई परंपराएं ऐसी हैं, जो सदियों से चली आ रही हैं। इन्हीं में से एक है मंदिर के शिखर पर रोज ध्वजा फहराने की परंपरा।
पंडित माधव चंद्र महापात्रा के अनुसार, “मंदिर के शिखर पर ध्वजा होना बेहद जरूरी माना जाता है। जिस तरह ब्राह्मणों के लिए शिखा का धार्मिक महत्व होता है, उसी तरह मंदिर के शिखर पर ध्वजा मंदिर को पूर्णता प्रदान करती है।”
पुराने समय में मंदिरों पर लगी ध्वजा को देखकर लोग कई तरह के संकेत भी समझते थे। ध्वजा किस दिशा में लहरा रही है, इसे लेकर अलग-अलग मान्यताएं प्रचलित थीं। हालांकि, जगन्नाथ मंदिर में ध्वजा का सबसे बड़ा महत्व धार्मिक आस्था और परंपरा से जुड़ा है।
चुनरा सेवकों की जिम्मेदारी केवल ध्वजा फहराना ही नहीं है, बल्कि श्रद्धालुओं की ओर से चढ़ाई गई ध्वजाओं को भी मंदिर के शिखर तक पहुंचाना है। यह सेवा बेहद कठिन मानी जाती है, क्योंकि इसके लिए सेवक को मंदिर के ऊंचे शिखर तक चढ़ना पड़ता है।
ध्वजा बदलने के दौरान चुनरा सेवक शिखर पर आगे की ओर मुंह करके चढ़ते हैं। यह काम काफी जोखिम भरा होता है, लेकिन सेवक पूरी श्रद्धा और परंपरा के साथ अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं।
क्या एक दिन ध्वजा न बदलने पर 18 साल बंद रहेगा मंदिर?सोशल मीडिया पर जगन्नाथ मंदिर की ध्वजा को लेकर कई तरह के दावे किए जाते हैं। इनमें एक दावा यह भी है कि अगर किसी दिन मंदिर के शिखर पर ध्वजा नहीं बदली गई तो मंदिर के कपाट 18 वर्षों तक बंद हो जाएंगे।
हालांकि, पंडित माधव चंद्र महापात्रा इस दावे को गलत बताते हैं। उनके अनुसार, “ऐसा कोई नियम नहीं है कि एक दिन ध्वजा नहीं बदलने पर मंदिर 18 वर्षों के लिए बंद हो जाएगा। हां, इस बात का ध्यान जरूरी रखा जाता है कि इस परंपरा को रोज निभाया जाए और वर्षों से इस रस्म में काई विघ्न आया भी नहीं है। ”
मंदिर के कपाट साल में एक विशेष अवधि के दौरान बंद होते हैं। यह समय भगवान जगन्नाथ की अनासर परंपरा से जुड़ा है। मान्यता के अनुसार, स्नान पूर्णिमा के बाद भगवान बीमार पड़ते हैं और लगभग 15 दिनों तक विश्राम करते हैं। इस दौरान भक्तों को उनके सामान्य दर्शन नहीं होते।
यही वजह है कि जगन्नाथ मंदिर की ध्वजा को केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि सदियों पुरानी आस्था और सेवाभाव की पहचान भी माना जाता है।
अत: पुरी के जगन्नाथ मंदिर में रोज ध्वजा फहराने की परंपरा हमें बताती है कि कुछ धार्मिक परंपराएं केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं होतीं, बल्कि उनके पीछे पीढ़ियों की आस्था, समर्पण और विश्वास भी जुड़ा होता है।



