Anant Chaturdashi Vrat Katha: हिंदू धर्म में अनंत चतुर्दशी का पर्व भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप को समर्पित माना जाता है। इस दिन श्रद्धालु भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करने के साथ व्रत रखते हैं और हाथ में 14 गांठों वाला अनंत सूत्र बांधते हैं। मान्यता है कि यह सूत्र भगवान अनंत का प्रतीक है और इसके माध्यम से भक्त सुख-समृद्धि तथा संकटों से मुक्ति की कामना करते हैं।
साल 2026 में अनंत चतुर्दशी 25 सितंबर, शुक्रवार को मनाई जा रही है। इस दिन अनंत भगवान की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि अनंत चतुर्दशी पर 14 गांठों वाला सूत्र क्यों बांधा जाता है और इस व्रत के पीछे कौन सी पौराणिक कथा जुड़ी है? आइए जानते हैं अनंत चतुर्दशी की प्रसिद्ध व्रत कथा।
अनंत चतुर्दशी की पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन समय में सुमंत नाम के एक ब्राह्मण रहते थे। उनकी पत्नी का नाम दीक्षा था। दोनों की एक पुत्री थी, जिसका नाम सुशीला था। सुशीला धार्मिक प्रवृत्ति और सद्गुणों से संपन्न थी।
समय बीतने के साथ सुशीला की माता का निधन हो गया। इसके बाद सुमंत ने कर्कशा नाम की महिला से दूसरा विवाह कर लिया। जब सुशीला विवाह योग्य हुई तो उसका विवाह कौंडिन्य ऋषि के साथ कर दिया गया।
कथा के अनुसार, विवाह के बाद जब सुशीला अपने पति के साथ विदा होने लगी तो उसकी सौतेली मां ने उन्हें उपहार के रूप में ईंट-पत्थर बांधकर दे दिए। इससे कौंडिन्य ऋषि को काफी दुख हुआ और वे सुशीला को लेकर अपने आश्रम की ओर चल पड़े।
सुशीला ने किया अनंत व्रत
रास्ते में रात हो जाने के कारण दोनों एक नदी के किनारे ठहर गए। वहां सुशीला ने कुछ महिलाओं को भगवान की पूजा करते हुए देखा। पूछने पर उसे अनंत व्रत के बारे में जानकारी मिली।
सुशीला ने भी श्रद्धा के साथ अनंत भगवान की पूजा की और 14 गांठों वाला अनंत सूत्र अपने हाथ में बांध लिया। इसके बाद वह अपने पति के पास लौट आई।
कौंडिन्य ऋषि ने जब उसके हाथ में बंधे सूत्र के बारे में पूछा तो सुशीला ने उन्हें पूरी बात बताई। हालांकि, ऋषि ने इस व्रत के महत्व को नहीं समझा और अनंत सूत्र को उतारकर अग्नि में डाल दिया।
अनंत सूत्र के अपमान से छिन गई समृद्धि
मान्यता के अनुसार, अनंत सूत्र के अनादर के बाद कौंडिन्य ऋषि के जीवन में परेशानियां बढ़ने लगीं। धीरे-धीरे उनकी संपत्ति और सुख-समृद्धि समाप्त हो गई। तब उन्होंने सुशीला से इसका कारण पूछा।
सुशीला ने बताया कि अनंत भगवान के सूत्र का अपमान किए जाने के कारण ही यह विपत्ति आई है। अपनी भूल का एहसास होने पर कौंडिन्य ऋषि ने भगवान अनंत से क्षमा मांगने का निर्णय लिया और उन्हें खोजने के लिए वन की ओर निकल पड़े।
भगवान अनंत ने दिए दर्शन
काफी समय तक भगवान के दर्शन न होने पर कौंडिन्य ऋषि बेहद व्याकुल हो गए। कथा के अनुसार, उनकी तपस्या और पश्चात्ताप से प्रसन्न होकर भगवान अनंत उनके सामने प्रकट हुए।
भगवान ने ऋषि को उनकी भूल का स्मरण कराया और बताया कि अनंत सूत्र का अपमान करने के कारण उन्हें कष्टों का सामना करना पड़ा। हालांकि, पश्चात्ताप देखकर भगवान ने उन्हें क्षमा कर दिया।
भगवान अनंत ने कौंडिन्य ऋषि को 14 वर्षों तक विधिपूर्वक अनंत व्रत करने का निर्देश दिया। साथ ही व्रत की अवधि पूरी होने के बाद विधि-विधान से इसका उद्यापन करने की बात कही।
व्रत के प्रभाव से दूर हुए कष्ट
कथा के अनुसार, कौंडिन्य ऋषि ने भगवान अनंत की आज्ञा का पालन करते हुए विधि-विधान से व्रत किया। इसके बाद उनके जीवन के कष्ट समाप्त हुए और उन्हें फिर से सुख-समृद्धि प्राप्त हुई।
धार्मिक मान्यताओं में यह भी उल्लेख मिलता है कि भगवान श्रीकृष्ण की सलाह पर युधिष्ठिर ने भी अनंत भगवान का व्रत किया था। मान्यता है कि इस व्रत के पुण्य प्रभाव से पांडवों को विपरीत परिस्थितियों में शक्ति और सफलता प्राप्त हुई।
14 गांठों वाले अनंत सूत्र का क्या महत्व है?
अनंत चतुर्दशी पर बांधे जाने वाले सूत्र में 14 गांठें लगाई जाती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार ये गांठें भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप और उनसे जुड़ी विभिन्न शक्तियों का प्रतीक मानी जाती हैं। श्रद्धालु इस सूत्र को श्रद्धा के साथ धारण कर भगवान विष्णु से परिवार की सुख-समृद्धि, सुरक्षा और संकटों से मुक्ति की प्रार्थना करते हैं।
हालांकि, अनंत सूत्र और व्रत से जुड़ी मान्यताएं धार्मिक परंपराओं पर आधारित हैं। अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं में इसकी पूजा-विधि में कुछ अंतर भी देखने को मिल सकता है।




