बिलासपुर हाईकोर्ट का आदेश: पत्नी की आत्महत्या मामले में डॉक्टर पति को 3 साल की सजा

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बिलासपुर : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पत्नी की आत्महत्या से जुड़े मामले में डॉक्टर पति की सजा के संबंध में आदेश दिया है। अदालत ने साक्ष्यों और परिजनों, विशेषकर बच्चों के बयानों पर विचार करते हुए डॉक्टर को तीन साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। साथ ही पहले जेल में बिताई गई अवधि को सजा में समायोजित करने का निर्देश दिया है। शेष सजा भुगतने के लिए डॉक्टर को 10 दिसंबर 2026 तक ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करना होगा।

मामले में डॉक्टर की ओर से उम्र करीब 50 वर्ष होने और परिवार की जिम्मेदारी उन्हीं पर होने की दलील दी गई थी। वहीं, मृतका के भाई आशीष नाथ की ओर से सजा कम करने का विरोध किया गया। राज्य शासन ने भी सजा कम करने का विरोध करते हुए अपराध की गंभीरता पर जोर दिया।

बच्चों की गवाही को माना गया अहम साक्ष्य

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने मृतका के बेटे, बेटी और माता-पिता के बयानों पर विचार किया। उपलब्ध विवरण के अनुसार, बच्चों ने अदालत को बताया कि उनके पिता डॉ. संजय प्रकाश के क्लीनिक में काम करने वाली एक नर्स के साथ कथित संबंध थे। इस बात का विरोध करने पर उनकी मां के साथ मारपीट और प्रताड़ना की जाती थी।

बच्चों के बयानों के मुताबिक, एक घटना में पिता ने मां पर चाबी फेंकी और फिर उनकी पिटाई की। उन्होंने यह भी बताया कि मां को पानी में घोलकर नींद की गोलियां दी गई थीं, जिससे उनकी हालत गंभीर हो गई थी। बयान में घटना से एक दिन पहले मारपीट किए जाने और तलाक देकर नर्स से शादी करने की धमकी दिए जाने का भी उल्लेख है।

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अदालत ने इन बयानों और मामले से जुड़े अन्य साक्ष्यों पर विचार किया।

क्या है पूरा मामला?

मामला बिलासपुर के सिविल लाइंस थाना क्षेत्र का है। यहां रहने वाली रश्मि प्रकाश ने अपने घर में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। मृतका के भाई आशीष नाथ ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराते हुए आरोप लगाया था कि डॉ. संजय प्रकाश की हिंसा और प्रताड़ना के कारण उनकी बहन ने यह कदम उठाया।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने 28 जून 2016 को दिए गए फैसले में डॉक्टर को भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए के तहत तीन साल के कारावास और 10 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। इस फैसले को डॉक्टर ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

पहले जेल में बिताई अवधि होगी समायोजित

सुनवाई के दौरान डॉक्टर के वकील ने दलील दी कि उनके मुवक्किल की उम्र करीब 50 वर्ष है और परिवार की जिम्मेदारी उन्हीं पर है। दूसरी ओर, मृतका के भाई के वकील ने अपराध की गंभीरता का हवाला देते हुए अधिकतम सजा दिए जाने की मांग की। राज्य शासन ने भी इस पक्ष का समर्थन किया।

हाईकोर्ट ने अपराध की गंभीरता और संबंधित धारा 498-ए के मामले में डॉक्टर की दोषसिद्धि को ध्यान में रखा। आदेश के मुताबिक, डॉक्टर पहले ही एक साल, दो महीने और 14 दिन जेल में बिता चुका है। इस अवधि को सजा में समायोजित किया जाएगा और शेष सजा पूरी करने के लिए उसे 10 दिसंबर 2026 तक ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण करना होगा।

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